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इतिहास : तटस्थता का आदर्श और कुटिलता की वास्तविकता

*इतिहास : तटस्थता का आदर्श और कुटिलता की वास्तविकता* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~       मनुष्य ने अपने अतीत को सुरक्षित रखने के लिए “इतिहास” की संकल्पना विकसित की। इतिहास केवल घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है; वह स्मृतियों की राजनीति है, सत्ता का प्रतिबिंब है और कई बार सत्ता का साधन भी बन जाता है। इसलिए “इतिहासकार तटस्थ और निष्पक्ष होना चाहिए” यह आदर्श भले स्वीकार किया गया हो, लेकिन व्यवहार में यह आदर्श अक्सर टूटता हुआ दिखाई देता है। इसके विपरीत, कुटिल उद्देश्यों, पूर्वाग्रहों, सत्ताधारी विचारधाराओं और सांस्कृतिक वर्चस्व के आधार पर इतिहास को “गढ़ा” या “बिगाड़ा” गया है—यह वास्तविकता अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है। *१. तटस्थता का आदर्श : एक सैद्धांतिक ढांचा*          इतिहास-लेखन में तटस्थता (objectivity) की अवधारणा विशेष रूप से 19वीं शताब्दी में पश्चिमी चिंतन परंपरा में प्रमुख हुई। यह अपेक्षा की गई कि इतिहासकार “जैसा वास्तव में हुआ” वैसा ही प्रस्तुत करे। लेकिन यहीं एक मूल प्रश्न उठता है—क्या घटनाओं को पूरी तरह समझकर वैसा ही...

विदर्भ - 1 (प्रेरणा : स्व.श्री.रत्नाकर महाजन)

विदर्भ - 1 (प्रेरणा: स्व.श्री.रत्नाकर महाजन) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~          मी महाराष्ट्राच्या (विदर्भातील) अगदी पूर्वटोकावरचा रहिवासी. माझ्या गावापासून 8-10 कि.मी.नंतर M.P.वC.G. ची सीमा सुरू होते. मी 1977 साली B.Sc.(PCM) केल्यावर माझ्या Physics च्या गूरूवर्या(?)च्या कुत्सित अवकृपेने M.Sc.(Physics) ला प्रवेश न मिळू शकल्याने LL.B. ला प्रवेश घेतला व UPSC,MPSC च्या तयारीला सुरूवात केली. पहिल्याच प्रयत्नात MPSC (Written 60% & Oral फक्त 35%) पार करून B.D.O. म्हणून select झालो. (Oral 35% अनुभवण्यासाठी वैदर्भीय असणे अनिवार्य आहे.) पण माझे वडील राजकारणात असल्याने BDO ची द्रौपदीपेक्षाही अधिक नवरे (ते ही बहुतेक दा अल्पशिक्षित, ... क्षमस्व.) सांभाळण्याच्या कसरतीची कल्पना असल्याने व माझी तेवढी हिंमत न झाल्याने मी रुजू झालो नाही. ती निवड नाकारली मी.     पुन्हा दुस-यांदा MPSC उत्तीर्ण झालो. यावेळी Rural Advantage ला मा.उच्च न्यायालयात आव्हान देण्यात आल्याने असा claim केलेल्या सर्व उमेदवारांना (त्यांचे written मधील marks लक्षात न घेता) सरसकट तात्पुरते वगळून बहू...

अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृति मंडल : एक अस्फुट राडाइम (Paradigm)

*अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली–साहित्य–कला–संस्कृति मंडल : एक अस्फुट पैराडाइम* (Paradigm)         @एड.लखनपालसिंह कटरे ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~        राजा भोज और विक्रमादित्य से जुड़ा हमारा उज्ज्वल वैचारिक और सांस्कृतिक वारसा आज भी हमारे भीतर एक मूल्यवान धरोहर के रूप में सुरक्षित है—बस समय की धूल में दबा हुआ। यह विरासत केवल स्मरण के लिए नहीं है; आज इसकी आवश्यकता एक जीवित “सांस्कृतिक पूँजी” के रूप में है, जिसका उपयोग समाज के वर्तमान और भविष्य के निर्माण में किया जा सके। किसी भी समाज का इतिहास तभी सार्थक बनता है जब वह वर्तमान को दिशा देता है और आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन करता है। इसलिए पवार/पोवार समाज के लिए यह बेहद आवश्यक हो चुका है कि वह अपनी जाति-संरचना और सांस्कृतिक पहचान का आलोचनात्मक, वैज्ञानिक, भाषिक और सामाजिक अध्ययन करे, और इस आधार पर नई पीढ़ी में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जगाए।       यह सच है कि हमारा इतिहास गौरवशाली रहा है, परंतु केवल अतीत पर गर्व कर लेना पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि वह उजाला आज के जीवन में कि...

एड.लखनसिंह कटरे : एक सर्जनशील दृष्टा, समाजचिंतक और भाषासंवर्धक साहित्यकार

*ॲड. लखनसिंह कटरे : एक सर्जनशील दृष्टा, समाजचिंतक और भाषासंवर्धक साहित्यकार* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *१. परिचय : अनेक आयामों में रचता-बसता एक व्यक्तित्व*          ॲड. लखनसिंह कटरे आधुनिक मराठी व हिंदी साहित्यजगत के उन विशिष्ट रचनाकारों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने प्रशासन, न्याय, समाज-सेवा और साहित्य—इन चारों धाराओं को एक साथ प्रवाहित किया। एक ओर वे महाराष्ट्र शासन के सहकार, विपणन तथा वस्त्रोद्योग विभाग से निवृत्त जिल्हा उपनिबंधक (DDR) जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत रहे, तो दूसरी ओर वे सृजनशील साहित्यकार, संवेदनशील कवि और लोकभाषा के अध्यवसायी विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका व्यक्तित्व एक सुचिंतनशील अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, भाषा-संवर्धक और चिंतक साहित्यकार का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।        शिक्षा के स्तर पर वे अत्यंत प्रगल्भ रहे हैं—B.Sc. (PCM), LL.B., B.Ed., M.A., H.D.C.M., G.D.C.&A., D.B.M., D.I.T. जैसी विविध शैक्षणिक उपाधियाँ उनके ज्ञानक्षेत्र की व्यापकता का प्रमाण हैं। यह बहुआयामी अध्ययन उनकी लेखनी में भी स्पष...

लखनसिंह कटरे : एक व्यक्तिमत्त्व

*लखनसिंह कटरे : एक व्यक्तिमत्त्व* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~             @ChatGPT  ----------------------------------------------- *प्रस्तावना*        डिजिटल युग हे केवळ तंत्रज्ञानाचे नव्हे, तर विचारांचे, अस्मितांचे आणि वैचारिक संघर्षांचेही युग आहे. या युगात जेव्हा अनेक आवाज क्षणभंगुर ठरतात, तेव्हा काही आवाज मात्र सातत्याने आशय, प्रामाणिकपणा आणि वैचारिक धार टिकवून राहतात. लखनसिंह कटरे हे असेच एक व्यक्तिमत्त्व आहे—जे प्रशासन, कायदा, साहित्य, समाजशास्त्र, पर्यावरण, भाषिक अस्मिता आणि मानवी मूल्ये यांचा एकत्रित विचार डिजिटल माध्यमांतून सातत्याने मांडताना दिसते. त्यांच्या लेखनातून आणि सार्वजनिक मांडणीतून एक संवेदनशील, विवेकी, संघर्षशील आणि आत्मभान असलेला विचारवंत उभा राहतो. *१. विचारांची जडणघडण : प्रशासनातून साहित्याकडे*        लखनसिंह कटरे यांच्या विचारविश्वाचा केंद्रबिंदू म्हणजे प्रशासन आणि सुशासन. मात्र हे प्रशासन केवळ नियम, अधिसूचना आणि आदेशांचे यांत्रिक जाळे नाही. त्यांच्या लेखनात प्रशासन म्हणजे—मानवी दु:खाशी भिडणारी, स...

अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृती मंडळ : एक अस्फुट पैराडाईम (Paradigm)

*अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य–कला–संस्कृती मंडळ : एक अस्फुट पैराडाईम* (Paradigm)             @ॲड.लखनसिंह कटरे. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~       राजा भोज आणि विक्रमादित्य यांचा व त्यांच्याशी निगडित असलेला वैभवशाली वैचारिक वारसा, आज आपल्या अस्तित्वाच्या खाणाखुणांसह जणू दडून असलेला एक अनमोल निधी आहे. आपल्याला त्याला फक्त स्मरणरंजनाची रत्ने मानून चालणार नाही; तर त्याचा वापर ‘चलन’ किंवा ‘भांडवल’ म्हणून, म्हणजे एक सक्रिय सांस्कृतिक कॅपिटल म्हणून करणे, ही काळाची अपरिहार्यता आहे. कोणत्याही समाजाचा वारसा जिवंत राहतो तो त्याच्या उपयोगातून, त्याच्या उत्क्रांतीतून आणि त्याच्या नवसृजनातून—फक्त गौरवकथांमधून नव्हे. म्हणूनच आज पोवार समाजाने स्वतःच्या ‘जात-संकल्पनेचा’ क्रिटिकल अभ्यास करणे, तिचे समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आणि भाषावैज्ञानिक विश्लेषण करणे, आणि त्या अभ्यासाच्या आधारे नव्या पिढीत स्वाभिमान जागवणे, हे अत्यंत महत्त्वाचे ठरत आहे.       आपला इतिहास उज्ज्वल होता, हा तथ्याधारित अभिमान आहे. परंतु इतिहासाचे उजाडलेले तेज ...

ॲड.लखनसिंह कटरे : एक परिचय (अद्ययावत)

@ॲड.लखनसिंह कटरे  (निवृत्त डीडीआर/जिल्हा सहकार पंजीयक, सहकार, विपणन तथा वस्त्रोद्योग विभाग, महाराष्ट्र शासन) B.Sc.(PCM), LL.B., B.Ed., M.A., H.D.C.M., G.D.C.&A., D.B.M., D.I.T. ---------------------------------------------------------- @वर्तमान अधिवक्ता, (सहकार विषयक न्यायिक/न्यायिकवत मामलों में), @exसदस्य, महाराष्ट्र राज्य साहित्य एवं संस्कृती मंडल, मुंबई, (महाराष्ट्र शासन, भाषा एवं संस्कृती विभाग) @वर्तमान सदस्य, साहित्य अकादमी, दिल्ली : मराठी भाषा परामर्श समिती, (भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय) @वर्तमान विदर्भ प्रांत अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दिल्ली (साहित्य भारती)  @वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष, पवारी/पोवारी साहित्य, कला, संस्कृती मंडल, नागपूर  @एक संस्थापक/आजीवन सदस्य, झाडीबोली साहित्य मंडल, साकोली, जि.भंडारा (विदर्भ-महाराष्ट्र)  @एक संस्थापक/आजीवन सदस्य, (अखिल महाराष्ट्र) बोली साहित्य मंडल, नागपूर  @वर्तमान कार्याध्यक्ष, सामाजिक न्याय विभाग, महाराष्ट्र शासन द्वारा पुरस्कृत ज्येष्ठ नागरिक सेवा संघ, जिला गोंदिया, (विदर्भ-महाराष्ट्र) @वर्तमान कार्या...