अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृति मंडल : एक अस्फुट राडाइम (Paradigm)
*अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली–साहित्य–कला–संस्कृति मंडल : एक अस्फुट पैराडाइम* (Paradigm) @एड.लखनपालसिंह कटरे ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ राजा भोज और विक्रमादित्य से जुड़ा हमारा उज्ज्वल वैचारिक और सांस्कृतिक वारसा आज भी हमारे भीतर एक मूल्यवान धरोहर के रूप में सुरक्षित है—बस समय की धूल में दबा हुआ। यह विरासत केवल स्मरण के लिए नहीं है; आज इसकी आवश्यकता एक जीवित “सांस्कृतिक पूँजी” के रूप में है, जिसका उपयोग समाज के वर्तमान और भविष्य के निर्माण में किया जा सके। किसी भी समाज का इतिहास तभी सार्थक बनता है जब वह वर्तमान को दिशा देता है और आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन करता है। इसलिए पवार/पोवार समाज के लिए यह बेहद आवश्यक हो चुका है कि वह अपनी जाति-संरचना और सांस्कृतिक पहचान का आलोचनात्मक, वैज्ञानिक, भाषिक और सामाजिक अध्ययन करे, और इस आधार पर नई पीढ़ी में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जगाए। यह सच है कि हमारा इतिहास गौरवशाली रहा है, परंतु केवल अतीत पर गर्व कर लेना पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि वह उजाला आज के जीवन में कि...