अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृति मंडल : एक अस्फुट राडाइम (Paradigm)

*अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली–साहित्य–कला–संस्कृति मंडल : एक अस्फुट पैराडाइम* (Paradigm)
        @एड.लखनपालसिंह कटरे
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       राजा भोज और विक्रमादित्य से जुड़ा हमारा उज्ज्वल वैचारिक और सांस्कृतिक वारसा आज भी हमारे भीतर एक मूल्यवान धरोहर के रूप में सुरक्षित है—बस समय की धूल में दबा हुआ। यह विरासत केवल स्मरण के लिए नहीं है; आज इसकी आवश्यकता एक जीवित “सांस्कृतिक पूँजी” के रूप में है, जिसका उपयोग समाज के वर्तमान और भविष्य के निर्माण में किया जा सके। किसी भी समाज का इतिहास तभी सार्थक बनता है जब वह वर्तमान को दिशा देता है और आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन करता है। इसलिए पवार/पोवार समाज के लिए यह बेहद आवश्यक हो चुका है कि वह अपनी जाति-संरचना और सांस्कृतिक पहचान का आलोचनात्मक, वैज्ञानिक, भाषिक और सामाजिक अध्ययन करे, और इस आधार पर नई पीढ़ी में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जगाए।
      यह सच है कि हमारा इतिहास गौरवशाली रहा है, परंतु केवल अतीत पर गर्व कर लेना पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि वह उजाला आज के जीवन में किस रूप में उतरता है। “हम क्या थे” से अधिक ज़रूरी है कि “हम अब क्या बनना चाहते हैं।” इसलिए हमें एक व्यापक, समग्र और दूरदर्शी सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता है। यह चहल-पहल केवल नारों, पोस्टरों या डिजिटल माध्यम पर दिखावे तक सीमित न रहते हुए—समाज, भाषा, विचार, कला, ज्ञान और सामूहिक चेतना को जोड़ने वाली एक गहरी सृजनशील प्रक्रिया बननी चाहिए।
       इसी दिशा में पवारी/पोवारी बोली–साहित्य–कला–संस्कृति मंडल का निर्माण हुआ है। यह केवल एक संगठन नहीं है; यह एक सांस्कृतिक धड़कन है, जिसमें प्रत्येक पवार/पोवार व्यक्ति का अधिकार, योगदान और उत्तरदायित्व निहित है। हमारा उद्देश्य प्राचीन पवारी/पोवारी कला, लोकगीत, नृत्य, वेशभूषा, लोककथाएँ, पारंपरिक अभिव्यक्तियाँ, तथा बोली के स्वर–लय–ताल के मूल रूपों का पुनर्स्मरण और पुनरुत्थान करना है। यह प्रयास केवल भावुकता पर आधारित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक, भाषावैज्ञानिक और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़ा हुआ एक संगठित अनुसंधान है। भाषा किसी समाज की स्मृति होती है, और पवारी बोली में आज भी हमारे पुरखों के जीवन, संघर्ष, परिवर्तन और यात्राओं की छापें स्पष्ट दिखाई देती हैं। इन्हें पहचानना, सुरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा दायित्व है।
        समय परिवर्तन लेकर आता है। जो समाज परिवर्तन को समझता है, वही बढ़ता है। पवार/पोवार शब्द और पहचान के ऐतिहासिक उद्गम, बोली में हुए ध्वन्यात्मक और उच्चारणगत बदलाव, भौगोलिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न रूपांतर—इन सबका अध्ययन किए बिना हम अपनी वर्तमान पहचान को ठीक प्रकार समझ ही नहीं सकते। इसलिए यह मंडल भाषाविज्ञान से लेकर सांस्कृतिक विज्ञान तक हर स्तर पर अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण कर रहा है। भाषा में परिवर्तन नकारात्मक नहीं होते—वे संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण होते हैं। परिवर्तन को समझना और उसके साथ आगे बढ़ना ही सच्ची प्रगति है।
        स्वाभाविक है कि कोई भी सामाजिक–सांस्कृतिक आंदोलन आलोचनाओं से मुक्त नहीं होता। कुछ लोग डिजिटल माध्यम पर हमारे कार्य पर प्रश्न उठाते हैं—कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर, कभी कठोर भाषा में, तो कभी गलतफहमियों से प्रेरित होकर। किंतु हम इन आलोचनाओं का स्वागत करते हैं, क्योंकि आलोचना आत्ममंथन और सुधार का माध्यम भी होती है। जैसे संतों ने कहा है, “निंदक पास हो तो बेहतर”—वही हमें अपनी कमियाँ पहचानने और आगे बढ़ने की शक्ति देता है। हमारे प्रयासों में त्रुटियाँ हो सकती हैं; परंतु उन त्रुटियों को स्वीकारकर सुधारने का साहस ही किसी भी आंदोलन को मजबूत बनाता है।
        इस पूरे प्रयास का अर्थ केवल भाषा का पुनरुत्थान नहीं है। बोली की रक्षा का मतलब है—एक समाज की जीवित स्मृति की रक्षा, उसकी पहचान की रक्षा, और उसके भविष्य की सुरक्षा। जब कोई भाषा मुरझाने लगती है, तो उस समाज की सांस्कृतिक आत्मा भी कमजोर होने लगती है। इसलिए पवारी/पोवारी बोली का संरक्षण केवल साहित्यिक या शैक्षणिक मुद्दा नहीं है; यह अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न है।
     इसी तरह पवार/पोवार समाज की प्राचीन कला–परंपराएँ भी आज पुनर्जीवन की प्रतीक्षा में हैं। लोककला, लोकनाट्य, चित्रकला, हस्तकला, पारंपरिक नृत्य—इन सबमें एक विशिष्ट सौंदर्य और सांस्कृतिक पहचान की झलक घुलमिल गई थी। यह कला आज भले ही छाया में चली गई हो, लेकिन उसकी आत्मा अभी भी जीवित है। नई पीढ़ी को इन परंपराओं से जोड़ना, उन्हें आधुनिक रूप देना और सांस्कृतिक रचनाशीलता को आगे लाना—यह हमारा स्थायी उद्देश्य है।
      अंततः इस आंदोलन का लक्ष्य केवल सांस्कृतिक उन्नति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक जागृति से लेकर भविष्य में राजनीतिक सशक्तिकरण तक जाने वाले एक बड़े परिवर्तन की नींव है। कोई भी समाज तभी राजनीतिक रूप से सक्षम बनता है, जब वह पहले स्वयं को सांस्कृतिक रूप से पहचान लेता है। इसलिए यह आंदोलन पवारी/पोवारी समाज के संपूर्ण उत्थान की दिशा में एक संगठित, सामूहिक और दीर्घकालीन यात्रा है।
      इस बड़े सांस्कृतिक यज्ञ में हर व्यक्ति का योगदान आवश्यक है—चाहे वह छोटा हो या बड़ा। यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति, संस्था या पद का नहीं है; यह पूरे समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक है। भविष्य में पवारी–पोवारी बोली आगे बढ़ेगी तो वह किसी एक प्रयास से नहीं, बल्कि समाज की संयुक्त इच्छाशक्ति से आगे बढ़ेगी।
      इसी आशा और विश्वास के साथ, हम सभी समाजबंधुओं से सहयोग, सहभागिता और समर्थन की अपेक्षा रखते हैं। यह प्रयास केवल भाषा बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सांस्कृतिक घरोहर को मजबूत नींव देने का है। हमारा यह छोटा-सा प्रयास, समय के प्रवाह में एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज बने—यही हमारी प्रार्थना है।
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@एड.लखनपालसिंह कटरे, 
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पवारी/पोवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृति मंडल, नागपूर 
[बोरकन्हार-441902, तह.आमगांव, 
जि.गोंदिया, (विदर्भ-महाराष्ट्र)]
चलभाष : 7066968350
(02.12.2024)
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