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Showing posts from August, 2025

ग्रामीण अर्थव्यवस्था : काही भ्रम (संक्षिप्त टिपण)

*ग्रामीण अर्थव्यवस्था : काही भ्रम (संक्षिप्त टिपण)* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~         ग्रामस्वराज्य ही संकल्पना ज्या काही मूलभूत घटकांवर आधारित आहे, त्यापैकी एक अत्यधिक महत्त्वाचा घटक म्हणजे एकूणच ग्रामीण अर्थव्यवस्थेचे सुदृढीकरण/स्वावलंबन हे होय. अशा या ग्रामीण अर्थव्यवस्थेची कायम वाढ व तिचा चिरंजीवी विकास साधल्याशिवाय महात्मा गांधीप्रणित ग्रामस्वराज्याची कल्पना फक्त एक कपोलकल्पित बाबच ठरेल.         वस्तूतः भारतीय अर्थव्यवस्था ही प्रामुख्याने ग्रामाधारित कृषी-अर्थव्यवस्था आहे. (संदर्भ : महात्मा गांधी, विनोबा व राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज यांचे विचार तथा नुकताच संपूर्ण मानवजातीला धडा शिकवून गेलेला कोरोना-काळ). अशा या ग्रामाधारित कृषी-अर्थव्यवस्थेचा पाया मजबूत, शाश्वत व टिकाऊ असल्या/झाल्याशिवाय एकूणच भारतीय अर्थव्यवस्थेचे सुदृढ असे कायम वाढीचे चिरंजीवी मंदिर उभेच राहू शकणार नाही. पाया मजबूत असेल तर आणि फक्त तरच इमारत व शिखरही मजबूत होऊ शकतो, हा निसर्गाचा अकाट्य नियमच आहे!  (अशी ही वस्तुस्थिती असली तरी, एखाद्याला दिवसाढवळ्या सूर्याकडे तोंड करून...

प्रतिभा का विकृत तथा विध्वंसक उपयोजन

*प्रतिभा का विकृत तथा विध्वंसक उपयोजन* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~       "बेरार टाईम्स" के दि.15 दिसंबर 2021 के अंक में प्रकाशित, द्वितीय अखिल भारतीय पोवारी बोली साहित्य संमेलन, नागपूर : 19 दिसंबर 2021 के उपलक्ष में प्राचीनतम पोवारी बोली के संदर्भ में लिखे गए, मेरे एक तथ्यपरक मराठी आलेख पर अनर्गल आक्षेप लेते हुए तथाकथित स्वयंघोषित इतिहासकार ओ.सी.पटले नामक व्यक्ती ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट प्रसारित की है।        उस फेसबुक पोस्ट में वह स्वयं को कुछ स्वयंघोषित उपाधियों से मंडित बताते हुए लिखते है कि वह 'इतिहासकार, अंतर्राष्ट्रीय कानून, राजनय, राजनीति शास्त्र एवं इतिहास के अभ्यासक है'। तथा उन्होने 'गहण संशोधन'(???) कर कामठा परगने के वीर राजे चिमना बहादुर पर एक संशोधनात्मक ऐतिहासिक(?) ग्रंथ प्रकाशित किया है, 'जिसे भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है'।         इस महाशय के इन सब गनगढ़न्त और मिथ्या आलापों/कलापों/दावों का तथ्यपरक खंडन करना आवश्यक हो गया है, ताकि अपनी प्रतिभा का ऐसा विकृत और विध्वंसक दुरुपयोग करनेवालों पर अंकुश लगाना संभव हो ...

महात्मा गांधी आणि असेच काहीतरी... (सडेतोड विचारविमर्शासाठी : एक मत असेही)

सडेतोड विचारविमर्शासाठी सविनय सादर... (एक मत असेही) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 👇 □महात्मा गांधी आणि असेच काहीतरी... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~      मला वाटते आम्ही भारतीय फक्त 'प्रतिक्रिया-वादी' बनून(!) गेलो आहोत. आजची भयावह व अस्वस्थ इंडियन(!) आणि भारतीय(!) वस्तुस्थिती पाहून आम्ही त्याविरुद्ध बोलभांडपणे तुटून पडतो. इंडिया आणि भारतातील सुमारे एकशे पस्तीस कोटी जनतेची दोनशे सत्तर कोटी पेक्षाही अधिक मते रोजच इथे-तिथे प्रकट होत असतात.       "हे चुकीचे घडते आहे, हे अनैतिक, अनैसर्गिक आहे, बेकायदेशीर आहे, संविधानच धोक्यात आले आहे, द्वेष/जात पात संवर्धन/आपसी तेढ/असहिष्णूता वाढत आहे,  देशाची एकजिनसी समाजव्यवस्था दुभंगू लागली आहे, राजकारणाची पत ऋणावून गेली आहे, आदर्श मानावा अशी माणसे व स्थिती दुर्मिळात दुर्मिळ झाली आहेत, वगैरे-वगैरे'' आपापल्या परीने व आपापल्या आकलनाप्रमाणे सांगण्या/बोलण्या/लिहिण्याची अहमहमिकाच जणू सुरू झाली आहे.       परंतु हे सर्व "परिणाम"(लक्षणे) मात्र आहेत, ही समस्या नसून समस्येचे हे "परिणाम"(लक्षणे) आहेत, हे आम्ही जा...

मुस्लिम तुष्टीकरण(?) : एक पैरेडाईम(Paradigm)

*मुस्लिम तुष्टीकरण(?): एक पैरेडाइम* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~        अहिंसा, प्रेम, शांति और क्षमा—ये सिद्धांत किसी एकतरफ़ा रास्ते (One Way Traffic) की तरह नहीं हो सकते। इनका आधार हमेशा आपसी संवाद और समान प्रतिक्रिया के शाश्वत प्राकृतिक सिद्धांत पर होना चाहिए। वैज्ञानिक और कानूनी दृष्टि से भी देखें तो हर क्रिया में ही उसकी प्रतिक्रिया निहित होती है। लेकिन, 15 अगस्त 1947 के सत्ता-परिवर्तन के बाद के शासकों ने अपनी तत्कालीन और बाद की शासन-प्रणाली में इस सिद्धांत को लगभग समाप्त करने की नीति अपनाई।           असल में, सत्ता-परिवर्तन से पहले और उसके बाद के समय में, भीषण दंगों और भारी जन-हानि के माहौल के बावजूद, जिन्होंने भारतभूमि को अपना मानकर यहीं रहने का संकल्प लिया—ऐसे मुस्लिम बहुसंख्यकों को भारतीय संस्कृति में सहजता से शामिल किया जा सकता था। मेरा अध्ययन यही दर्शाता है। लेकिन सत्ता-परिवर्तन के बाद के शासकों ने इस प्राचीन भारतीय संस्कृति-प्रेरित अहिंसा, प्रेम, शांति और क्षमा की नीति को न्यायसंगत व प्राकृतिक रूप से अपनाने के बजाय, इन शाश्वत मूल्यों...

बढ़ती नकारात्मकता का बढ़ता प्रसार

छह साल पुरानी मेरी एक अनदेखी मराठी पोस्ट का हिंदी अनुवाद फिर से साझा कर रहा हूँ...! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *“बढ़ती नकारात्मकता का बढ़ता प्रसार”* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~      दि.11 अप्रैल 2019 के (मराठी अखबार) “लोकसत्ता” में दिगंबरजी शिंदे का लेख "वाढत्या नकारात्मकतेचे वय..." [“बढ़ती नकारात्मकता की उम्र...”] पढ़ा, जो भविष्य में आने वाली गंभीर घटनाओं की चेतावनी देता है।        दिगंबरजी ने इस चिंताजनक लेख में लिखा है कि, — “भारतीय लोकतंत्र अब सातवें दशक में प्रवेश कर चुका है, लेकिन कर्तव्य के प्रति जो उदासीनता है और अधिकारों के प्रति जो जरूरत से ज्यादा जागरूकता है, उसके बीच संतुलन लाने का कोई प्रयास होता नहीं दिखता।” --- इसके बाद उन्होंने स्पष्ट और तार्किक विश्लेषण करते हुए यह कटु सच्चाई रखी— “पेट पालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है—यह बात आज की (युवाओं की) समझ से बाहर हो चुकी है।”  यहीं से उन्होंने सवाल उठाया— “जो नकारात्मकता आमतौर पर बुढ़ापे या रिटायरमेंट के बाद आती है, वह आज इतनी कम उम्र में कैसे आ गई?”       मैं खुद फरवरी 2013 म...

वाढत्या नकारात्मकतेचे वाढते प्रस्थ

सहा वर्षापूर्वीची माझी एक दुर्लक्षित पोस्ट पुनश्च अग्रेषित... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ "वाढत्या नकारात्मकतेचे वाढते प्रस्थ" ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~      दि.11 एप्रिल 2019 च्या "लोकसत्ता" मधील दिगंबरजी शिंदे यांचा "वाढत्या नकारात्मकतेचे वय..." हा भविष्यातील भयंकर दुर्घटनेची चाहूल "सांगणारा" लेख वाचला.       दिगंबरजींनी त्यांच्या या भयसूचक लेखात, "भारतीय लोकशाही आता सातव्या दशकात पोहोचली असताना कर्तव्याबाबत असलेली उदासिनता, तर हक्कांबाबत नको इतकी जागृतता यातील समतोल साधण्याचा प्रयत्न होत असल्याचे दिसत नाही." येथून सुरू केलेले त्यांचे सुस्पष्ट व तर्कशुद्ध विवेचन आणि विश्लेषण "हातातोंडाची गाठ पडण्यासाठी राबणूक करावी लागते' हे सध्या (तरुणाईच्या) गावीच उरलेले नाही." या #BitterReality च्या प्रतिपादनातून "निवृत्तीनंतर जी नकारात्मकता सहसा येते, ती आज इतक्या कमी वयात कशी काय(?)..." या प्रश्नापाशी त्यांनी थांबवले आहे.        मी माझ्या निवृत्तीनंतर गेली साडेबारा वर्षे माझ्या खेडेगावात (लोकसंख्या सुमारे 2350) स्थायिक/वास्तव्य ...