इतिहास : तटस्थता का आदर्श और कुटिलता की वास्तविकता
*इतिहास : तटस्थता का आदर्श और कुटिलता की वास्तविकता*
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मनुष्य ने अपने अतीत को सुरक्षित रखने के लिए “इतिहास” की संकल्पना विकसित की। इतिहास केवल घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है; वह स्मृतियों की राजनीति है, सत्ता का प्रतिबिंब है और कई बार सत्ता का साधन भी बन जाता है। इसलिए “इतिहासकार तटस्थ और निष्पक्ष होना चाहिए” यह आदर्श भले स्वीकार किया गया हो, लेकिन व्यवहार में यह आदर्श अक्सर टूटता हुआ दिखाई देता है। इसके विपरीत, कुटिल उद्देश्यों, पूर्वाग्रहों, सत्ताधारी विचारधाराओं और सांस्कृतिक वर्चस्व के आधार पर इतिहास को “गढ़ा” या “बिगाड़ा” गया है—यह वास्तविकता अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है।
*१. तटस्थता का आदर्श : एक सैद्धांतिक ढांचा*
इतिहास-लेखन में तटस्थता (objectivity) की अवधारणा विशेष रूप से 19वीं शताब्दी में पश्चिमी चिंतन परंपरा में प्रमुख हुई। यह अपेक्षा की गई कि इतिहासकार “जैसा वास्तव में हुआ” वैसा ही प्रस्तुत करे। लेकिन यहीं एक मूल प्रश्न उठता है—क्या घटनाओं को पूरी तरह समझकर वैसा ही प्रस्तुत करना मनुष्य के लिए संभव है?
मनुष्य स्वयं मूल्यों से जुड़ा प्राणी है। उसकी समझ पर उसके संस्कार, शिक्षा, राजनीतिक दृष्टिकोण, धार्मिक मान्यताएँ और सामाजिक स्थिति का प्रभाव पड़ता है। ऐसे में इतिहासकार पूरी तरह निष्पक्ष रह सकता है—यह विचार सैद्धांतिक रूप से आकर्षक तो है, पर व्यवहार में अवास्तविक लगता है।
*२. इतिहास और सत्ता का संबंध*
अक्सर कहा जाता है कि इतिहास सत्ता का दर्पण होता है। जो लोग सत्ता में होते हैं, वही अपनी कथा को “आधिकारिक इतिहास” के रूप में स्थापित करते हैं। इस कारण इतिहास केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान सत्ता-संबंधों का परिणाम भी होता है।
उदाहरण के लिए, औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत का इतिहास इस तरह प्रस्तुत किया कि भारतीय समाज पिछड़ा, अव्यवस्थित और स्वयं के विकास में अक्षम है; इसलिए ब्रिटिश शासन आवश्यक था। यह प्रस्तुति निष्पक्ष नहीं थी, बल्कि सत्ता को उचित ठहराने वाली थी। इसी प्रकार, कई राजाओं और सम्राटों ने अपने शासन का महिमामंडन करने के लिए इतिहासकारों को संरक्षण दिया। उनके विजय को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, जबकि पराजयों को छिपाया या छोटा करके दिखाया गया।
*३. कुटिल उद्देश्य और इतिहास का विकृतिकरण*
इतिहास का विकृतिकरण कई स्तरों पर होता है—
(अ) चयनात्मक स्मृति (Selective Memory) :- कुछ घटनाओं को प्रमुखता दी जाती है, जबकि कुछ को जानबूझकर भुला दिया जाता है। किसी राष्ट्र के गौरव के लिए उसके अतीत के हिंसक या नकारात्मक पहलुओं को छिपाया जाता है।
(आ) भाषाई कुटिलता (Linguistic Manipulation) :- शब्दों का चयन भी निष्पक्ष नहीं होता। “विद्रोह” या “स्वतंत्रता संग्राम”? “आक्रमण” या “विस्तार”? ऐसे शब्द घटनाओं के अर्थ को बदल देते हैं।
(इ) नायक और खलनायक का निर्माण :- इतिहास में कुछ व्यक्तियों को अत्यधिक महिमामंडित कर नायक बना दिया जाता है, जबकि कुछ को पूरी तरह खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रक्रिया में वास्तविकता की जटिलता खत्म हो जाती है।
*४. भारतीय संदर्भ में उदाहरण*
भारतीय इतिहास में भी इस प्रकार के विकृतिकरण के उदाहरण मिलते हैं। प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल की कई घटनाओं की व्याख्या विभिन्न विचारधाराओं के प्रभाव में की गई है।
कुछ इतिहासकारों ने मध्यकालीन सत्ता-संघर्षों को केवल धार्मिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया।
स्वतंत्रता संग्राम के कुछ नेताओं के योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, जबकि कुछ के योगदान को नजरअंदाज किया गया।
स्थानीय, आदिवासी और वंचित समाजों के इतिहास को मुख्य धारा में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
यह सब केवल संयोग नहीं है, बल्कि कई बार एक योजनाबद्ध और कुटिल प्रवृत्ति का परिणाम होता है।
*५. इतिहासकार की नैतिक जिम्मेदारी*
इतिहासकार पूरी तरह निष्पक्ष न हो सके, फिर भी वह ईमानदार तो रह सकता है—यही उसकी सबसे बड़ी नैतिकता है। उसे चाहिए कि वह—
● विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करे,
● विरोधी दृष्टिकोणों को समझे,
● अपने पूर्वाग्रहों के प्रति सजग रहे,
और सबसे महत्वपूर्ण—
● सत्य की खोज में ईमानदारी बनाए रखे।
इतिहासकार केवल लेखक नहीं होता, बल्कि वह एक जिम्मेदार साक्षी भी होता है। उसके लेखन का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है।
*६. पाठक की भूमिका भी महत्वपूर्ण*
इतिहास का विकृतिकरण केवल इतिहासकारों के कारण नहीं होता; पाठक भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। यदि पाठक बिना सोचे-समझे किसी भी इतिहास को स्वीकार कर लेते हैं, तो कुटिल उद्देश्य वाले लेखक और अधिक मजबूत हो जाते हैं।
इसलिए इतिहास पढ़ते समय प्रश्न करना, विभिन्न स्रोतों की जाँच करना और तर्कपूर्ण सोच रखना—यह पाठक का कर्तव्य है।
*७. निष्कर्ष : तटस्थता का आदर्श या सजगता की आवश्यकता?*
इतिहासकार तटस्थ होना चाहिए—इस आदर्श को छोड़ा नहीं जा सकता। लेकिन यह पूरी तरह संभव होगा, ऐसी अपेक्षा भी नहीं रखी जा सकती। इसलिए अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण यह है कि इतिहास-लेखन में पारदर्शिता, ईमानदारी और बहुलता (plurality) को महत्व दिया जाए।
इतिहास केवल अतीत का दर्पण नहीं, बल्कि वर्तमान का मार्गदर्शक और भविष्य का खाका भी है। इसलिए उसका विकृतिकरण केवल बौद्धिक गलती नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
*अंतिम विचार*
“इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है”—यह बात हम अक्सर सुनते हैं। लेकिन आज के सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में यह संतुलन कुछ हद तक बदला जा सकता है—यदि हम सजग रहें। अन्यथा, कुटिल उद्देश्य वाले लेखक केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की दिशा भी तय करेंगे।
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@अॅड. लखनसिंह कटरे,
(28/03/2020/पुनर्लेखन-28/03/2026)
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