एड.लखनसिंह कटरे : एक सर्जनशील दृष्टा, समाजचिंतक और भाषासंवर्धक साहित्यकार

*ॲड. लखनसिंह कटरे : एक सर्जनशील दृष्टा, समाजचिंतक और भाषासंवर्धक साहित्यकार*
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*१. परिचय : अनेक आयामों में रचता-बसता एक व्यक्तित्व*
         ॲड. लखनसिंह कटरे आधुनिक मराठी व हिंदी साहित्यजगत के उन विशिष्ट रचनाकारों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने प्रशासन, न्याय, समाज-सेवा और साहित्य—इन चारों धाराओं को एक साथ प्रवाहित किया। एक ओर वे महाराष्ट्र शासन के सहकार, विपणन तथा वस्त्रोद्योग विभाग से निवृत्त जिल्हा उपनिबंधक (DDR) जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत रहे, तो दूसरी ओर वे सृजनशील साहित्यकार, संवेदनशील कवि और लोकभाषा के अध्यवसायी विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका व्यक्तित्व एक सुचिंतनशील अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, भाषा-संवर्धक और चिंतक साहित्यकार का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
       शिक्षा के स्तर पर वे अत्यंत प्रगल्भ रहे हैं—B.Sc. (PCM), LL.B., B.Ed., M.A., H.D.C.M., G.D.C.&A., D.B.M., D.I.T. जैसी विविध शैक्षणिक उपाधियाँ उनके ज्ञानक्षेत्र की व्यापकता का प्रमाण हैं। यह बहुआयामी अध्ययन उनकी लेखनी में भी स्पष्ट झलकता है—जहाँ वैज्ञानिक दृष्टि, विधिशास्त्रीय तर्क, और मानवीय संवेदना एक साथ उपस्थित रहते हैं।

*२. प्रशासनिक जीवन से सामाजिक दायित्व तक*
        लखनसिंह कटरे ने महाराष्ट्र शासन के सहकार, विपणन व वस्त्रोद्योग विभाग में दीर्घ सेवा दी और “जिल्हा सहकार पंजीयक” (DDR) के रूप में कोंकण और खान्देश को छोड़कर उर्वरित महाराष्ट्र के लगभग सभी क्षेत्रों में कार्य किया। सहकार क्षेत्र की नीतियों, ग्रामीण विकास तथा प्रशासनिक पारदर्शिता के प्रति उनका दृष्टिकोन प्रगतिशील रहा। सेवानिवृत्ति के पश्चात भी उन्होंने स्वयं को विश्रांति में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और कानूनी परामर्श के कार्यों में समर्पित किया। वर्तमान में वे सहकार विषयक न्यायिक व अर्धन्यायिक मामलों के अधिवक्ता के रूप में सक्रिय हैं।

      प्रशासनिक अनुभव और मानवीय संवेदना का संगम उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है। समाज के उपेक्षित वर्गों, ग्रामीण जीवन और भाषाई अस्मिता के प्रति उनका जुड़ाव गहरा है—यही कारण है कि उनके अधिकांश लेखन में लोकसंस्कृति, इतिहासबोध और सामाजिक न्याय का स्वर प्रखर रूप से मुखरित होता है।

*३. साहित्यिक-संस्कृतिक दायरा : महाराष्ट्र से भारत तक*
      कटरेजी के साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्य का विस्तार अत्यंत व्यापक है। वे केवल लेखक ही नहीं, बल्कि संगठनकर्ता और चिंतक भी हैं।
वे रहे हैं—
●भूतपूर्व सदस्य, महाराष्ट्र राज्य साहित्य एवं संस्कृती मंडळ, मुंबई (महाराष्ट्र शासन, भाषा व संस्कृती विभाग)
●वर्तमान सदस्य, साहित्य अकादमी, दिल्ली — मराठी भाषा परामर्श समिती (भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय)
●वर्तमान विदर्भ प्रांत अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दिल्ली (साहित्य भारती)
●राष्ट्रीय अध्यक्ष, पवारी/पोवारी साहित्य, कला, संस्कृती मंडल, नागपूर
●संस्थापक/आजीवन सदस्य, झाडीबोली साहित्य मंडल, साकोली (भंडारा) तथा अखिल महाराष्ट्र बोली साहित्य मंडल, नागपूर
●कार्याध्यक्ष, ज्येष्ठ नागरिक सेवा संघ (सामाजिक न्याय विभाग, महाराष्ट्र शासन पुरस्कृत), गोंदिया
●कार्याध्यक्ष, कृतिशील निवृत्त अधिकारी संघ, गोंदिया
●सदस्य, महाराष्ट्र शासन-प्रणीत जिल्हा मराठी भाषा समिती (गोंदिया जिल्हाधिकारी कार्यालय)
●वर्तमान उपसरपंच, ग्रामपंचायत बोरकन्हार, ता. आमगाव, जि. गोंदिया
      इन सभी भूमिकाओं से यह स्पष्ट है कि साहित्य उनके लिए केवल सृजन नहीं, बल्कि जनसंपर्क और समाजसेवा का माध्यम है।

*४. रचनाधर्मिता : सृजन का विस्तृत संसार*
      कटरेजी की साहित्यिक यात्रा तीन दशकों से अधिक समय में फैली हुई है। वे मराठी, हिंदी, अंग्रेजी, झाडीबीली और पोवारी पाचों भाषाओं में समान दक्षता रखते हैं। उनके काव्य, कथा, लेख और भाषिक चिंतन – सबमें स्थानीय जीवन, झाडीपट्टी की मिट्टी, सामाजिक संघर्ष और मानवीय स्वप्न गूँजते हैं।
प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ (1996 – 2023)
क्रमांक कृति का नाम प्रकार / वर्ष / विशेष विवरण
●1 प्रमेय (1996) मराठी कवितासंग्रह – हिंदी अनुवाद जनवरी 2026 में अपेक्षित
●2 जाणिवेतले कर्कदंश (2000) कवितासंग्रह; कविता “जागर” नागपूर विश्वविद्यालय के बी.कॉम पाठ्यक्रम में सम्मिलित
●3 एकोणिसावा अध्याय (2001) कथासंग्रह; डॉ. हरिश्चंद्र बोरकर की विस्तृत प्रस्तावना सहित
●4 शाश्वत मौनाचे स्वगत (2002) अभंगसंग्रह; आधुनिक मराठी का प्रथम आधुनिक अभंगसंग्रह (डाॅ. अनिल नितनवरे)
●5 आदिम प्रकाशचित्रे (2004) चित्र-काव्यसंग्रह; लोकमत साहित्य-पूरक में चर्चित; “तुका म्हणे” पुरस्कार (2006)
●6 शब्दार्थांचे आधार निष्फळ (2005) कवितासंग्रह; प्रस्तावना – डाॅ. हरिश्चंद्र बोरकर
●7 लेक नि विवेक (2007) संकीर्ण संग्रह
●8 इतिहास आढळत नाही (2018) दीर्घकविता; डाॅ. दत्तप्रसाद दाभोळकर द्वारा समीक्षित
●9 आखिर बचता तो अंधेरा ही है (2020) हिंदी कवितासंग्रह
●10 पोवारी साहित्य मंजूषा (2020) प्राचीन पोवारी बोली का संकलन
●11 इतिहास दृष्टिगत नहीं (2021) “इतिहास आढळत नाही” का हिंदी अनुवाद (अनुवादक – डाॅ. निर्मल चक्रधर)
●12 अवरुद्धलेल्या रुंद वाटा (2021) कवितासंग्रह; प्रस्तावना – डाॅ. सुनीलकुमार लवटे
●13 सरकते आहे वाळू (2021) ग्रंथाली प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित कवितासंग्रह
●14 गावखारी अना कामथ (2022) झाडीबोली व मराठी गद्य-पद्य रचनाएँ
●15 पोवार समाज तथा पोवारी बोली : एक आकलन (2022) लेखसंग्रह (हिंदी-मराठी-पोवारी)
●16 मुजोरी : न-गझलांची आणि इतर कविता (2023) कवितासंग्रह, अक्षरशिल्प प्रकाशन, अमरावती
●17 आडवळणावरील काही स्थानके (2023) लेख व निबंध संग्रह, गोवर्धन बिसेन पब्लिशर, गोंदिया
●18-19 एम.ए. (लोकप्रशासन) हेतु दो पाठ्य-पुस्तकें (यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठ, नाशिक) 
        यह सूची उनकी सृजन-समृद्धि का स्पष्ट परिचायक है। उनकी कविताओं में समाज-दर्शन, मानव-मूल्य और समय की विडंबनाओं का मार्मिक चित्रण है। “इतिहास आढळत नाही” जैसी दीर्घकविता इतिहास-स्मृति की खोई कड़ियों को तलाशती है, जबकि “पोवार समाज तथा पोवारी बोली : एक आकलन” जैसी पुस्तक भाषा-अध्ययन और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।

*५. समीक्षात्मक मान्यता व पुरस्कार*
    लखनसिंह कटरे के लेखन को साहित्यजगत में गम्भीरता से स्वीकारा गया है।
●“आदिम प्रकाशचित्रे” को जनवरी 2006 में बुलढाणा के प्रतिष्ठित “तुका म्हणे” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
●“इतिहास आढळत नाही” पर सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक-साहित्यिक डाॅ. दत्तप्रसाद दाभोळकर का विस्तृत समीक्षण प्रकाशित हुआ।
●“अवरुद्धलेल्या रुंद वाटा” की विवेचक प्रस्तावना डाॅ. सुनीलकुमार लवटे ने दी है, जिन्होंने इसे आधुनिक मराठी कविता का संवेदनशील दस्तावेज बताया।
       इसके अतिरिक्त अनेक मराठी पत्रिकाओं—साधना, भाषा आणि जीवन, शब्द रुची, साहित्य चपराक, आंदोलन, मौज, अंतर्नाद, तरुण भारत, लोकमत, महाराष्ट्र टाईम्स आदि—में उनके लेख, कविता और निबंध प्रकाशित हुए हैं। हिंदी जगत में भी दिवान मेरा, मड़ई-2020, प्रकाशित मन, दिनमान, रविवार और इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं ने उनके विचार, लेख, पत्र व कविताएँ प्रकाशित कीं।

*६. भाषा और बोली का समर्पित साधक*
      कटरेजी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है—झाडीबोली और पोवारी बोली के अध्ययन-संवर्धन में। वे “झाडीबोली साहित्य मंडल” और “पोवारी साहित्य मंडल” जैसे संगठनों के संस्थापक सदस्य हैं। इन लोकबोलियों को वे न केवल भाषिक धरोहर मानते हैं, बल्कि सामाजिक पहचान का आधार भी मानते हैं।

उनकी मान्यता है कि –

> “जब तक बोली जीवित है, तब तक भाषा अमर है।”

      यह विचार मराठी व हिंदी दोनों साहित्यिक परंपराओं में लोकभाषा के सम्मान की दिशा में एक सशक्त वैचारिक संकेत देता है। उन्होंने बोली-साहित्य को शैक्षणिक और सांस्कृतिक मंचों पर प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य किया।

*७. विचारधारा : समाज, इतिहास और आत्मबोध*
     उनकी कविताओं और निबंधों में तीन मुख्य प्रवृत्तियाँ मिलती हैं—
●1. सामाजिक न्याय और मानवतावाद,
●2. इतिहास-बोध और सांस्कृतिक जड़ों की खोज,
●3. आत्मानुभूति और अस्तित्व-विवेक।
       उनकी कविता “जागर” में जनजागरण की प्रखर चेतना है। “इतिहास आढळत नाही” में अतीत के विस्मरण की पीड़ा है, जबकि “प्रमेय” और “शब्दार्थांचे आधार निष्फळ” में शब्द की अर्थवत्ता और उसकी सीमाओं पर गहन चिंतन मिलता है।
       उनका लेखन लोक और शास्त्र, भाव और तर्क, परंपरा और आधुनिकता—इनके बीच संतुलन बनाता है। यही उन्हें एक विचारशील आधुनिक कवि-लेखक बनाता है।

*८. सामाजिक-संघटनात्मक भूमिका*
      प्रशासनिक दायित्व से निवृत्त होने के पश्चात भी उनका सामाजिक योगदान सक्रिय है।
●वे ज्येष्ठ नागरिक सेवा संघ (सामाजिक न्याय विभाग, महाराष्ट्र शासन पुरस्कृत) तथा कृतिशील निवृत्त अधिकारी संघ (गोंदिया) के कार्याध्यक्ष हैं।
●ग्रामपंचायत बोरकन्हार के उपसरपंच के रूप में वे ग्रामीण विकास, पर्यावरण और शिक्षा-संवर्धन के विषयों में सक्रिय हैं।
●साहित्यिक संस्थाओं के माध्यम से वे युवा लेखकों को मंच देते हैं, लेखन-कार्यशालाओं में मार्गदर्शन करते हैं और भाषिक विविधता के सम्मान का संदेश फैलाते हैं।

*९. वर्तमान एवं आगामी लेखन-कार्य*
    हाल के वर्षों में उन्होंने कई नई परियोजनाएँ प्रारंभ की हैं —
      मराठी में “औरस चौरस”, “वास्तव अवास्तव”, “अशब्दाची शब्दगाथा”, “ग्रामीण अर्थव्यवस्था : काही भ्रम…”, “मी : एक राजपत्रित अधिकारी” जैसी कृतियाँ प्रकाशनाधीन हैं।
      हिंदी में “इब्ने शफी की जासूसी दुनिया” तथा “…चिड़िया चुग गई खेत” जैसे ग्रंथ आगामी हैं।
      महाराष्ट्र टाईम्स (नागपूर) में उन्होंने “औरस चौरस” शीर्षक से चार महीने तक साप्ताहिक सदर लेखन किया, जिसे पाठकों ने विशेष सराहना दी।
       यह रचनात्मक सततता उनकी साहित्यिक ऊर्जा और समाज के प्रति समर्पण का परिचायक है।

*१०. वैचारिक सारांश : साहित्य एक सामाजिक दस्तावेज*
      कटरेजी का मानना है कि साहित्य केवल सौंदर्य-बोध का साधन नहीं, बल्कि समाज के आत्म-परिवर्तन का माध्यम है। उनका लेखन व्यक्ति-केन्द्रित नहीं, बल्कि समष्टि-केन्द्रित है। वे अपने समय की विसंगतियों पर सजग दृष्टि रखते हैं, परंतु आलोचना में कटुता नहीं, संवेदना और संवाद का स्वर है।
      उनकी भाषा सरल परंतु बहुअर्थी है, और उनकी कविता आधुनिक मराठी साहित्य की सामाजिक चेतना-परंपरा का स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होती है। बोली-साहित्य, इतिहास, न्यायशास्त्र और लोकजीवन—इन सभी विषयों को उन्होंने एक ही छतरी के नीचे जोड़ा है।

*११. निष्कर्ष : एक समर्पित रचनाकार और लोकचिंतक*
     ॲड. लखनसिंह कटरे का सम्पूर्ण जीवन सेवा, सृजन और संवेदना की त्रिवेणी है। उन्होंने शासन-व्यवस्था में पारदर्शिता, समाज में समानता, और साहित्य में लोकभाषा का गौरव—इन तीनों को जीवन-आदर्श बनाया।
        आज वे न केवल विदर्भ-महाराष्ट्र के, बल्कि संपूर्ण मराठी-हिंदी साहित्य-जगत के एक ऐसे रचनाकार हैं, जिनके लेखन में प्रशासक की अनुशासनशीलता, विधिवेत्ता की तर्कशीलता, और कवि का हृदयस्पर्शी भावलोक—सभी का सुंदर समन्वय है। उनकी लेखनी और कार्य-दिशा यह सिद्ध करती है कि—
> “साहित्य समाज का आईना है, और समाज का परिवर्तन तभी संभव है जब भाषा अपने लोक से जुड़ी रहे।”
      इसी विश्वास और दृढ़ आस्था के साथ ॲड. लखनसिंह कटरे अपनी सृजन-यात्रा निरंतर जारी रखे हुए हैं — एक ऐसे रचनाकार के रूप में, जो शब्दों के माध्यम से समाज को प्रकाश की दिशा देता है।
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(कुल शब्द : लगभग 1,570)
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लेखक : ChatGPT 
दि.12.11.2025 
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