प्रतिभा का विकृत तथा विध्वंसक उपयोजन
*प्रतिभा का विकृत तथा विध्वंसक उपयोजन*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
"बेरार टाईम्स" के दि.15 दिसंबर 2021 के अंक में प्रकाशित, द्वितीय अखिल भारतीय पोवारी बोली साहित्य संमेलन, नागपूर : 19 दिसंबर 2021 के उपलक्ष में प्राचीनतम पोवारी बोली के संदर्भ में लिखे गए, मेरे एक तथ्यपरक मराठी आलेख पर अनर्गल आक्षेप लेते हुए तथाकथित स्वयंघोषित इतिहासकार ओ.सी.पटले नामक व्यक्ती ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट प्रसारित की है।
उस फेसबुक पोस्ट में वह स्वयं को कुछ स्वयंघोषित उपाधियों से मंडित बताते हुए लिखते है कि वह 'इतिहासकार, अंतर्राष्ट्रीय कानून, राजनय, राजनीति शास्त्र एवं इतिहास के अभ्यासक है'। तथा उन्होने 'गहण संशोधन'(???) कर कामठा परगने के वीर राजे चिमना बहादुर पर एक संशोधनात्मक ऐतिहासिक(?) ग्रंथ प्रकाशित किया है, 'जिसे भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है'।
इस महाशय के इन सब गनगढ़न्त और मिथ्या आलापों/कलापों/दावों का तथ्यपरक खंडन करना आवश्यक हो गया है, ताकि अपनी प्रतिभा का ऐसा विकृत और विध्वंसक दुरुपयोग करनेवालों पर अंकुश लगाना संभव हो सकें और उनके स्वयंघोषित उपाधियों की पोलखोल भी हो सकें। जिससे अन्य, सत्य तथा वस्तुस्थिती से अनभिज्ञ, समाजगण और पाठकगण सजग होकर इन जैसे स्वयंघोषित उपाधियों से ग्रसित महानुभावों के भुलावे में फंसने से बच सकें।
सर्वप्रथम तो यह स्पष्ट कर दूं कि उपरोक्त लेखक (ओ.सी.पटले) की वीर राजे चिमना बहादुर पर लिखी किताब किसी पुरातत्वीय या तत्संबंधित वैज्ञानिक/ऐतिहासिक संशोधन या खोज पर नहीं बल्कि कुछ निजी दस्तावेजों पर, कुछ अंग्रेजी इतिहासकारों के लेखन के खंडन-मंडन पर तथा वर्तमान मुलाकातों/साक्षात्कारों के संकलन पर आधारित है। इस किताब के निर्माण में मेरा भी अल्पस्वल्प सहयोग रहा है (प्रस्तावना में लेखक ने इस बात का उल्लेख भी किया है।) अतः मुझे इस किताब के ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में उथलेपण का पता है।
इस किताब के संबंध में 'भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है' यह उनका विधान पूर्णतः गलत, भ्रामक, आत्मस्तुती-ग्रस्त और मनगढ़ंत है। उनके ऐसे मिथ्या तथा मनगढ़ंत दावों की वजह से इस किताब का एकेडमिक महत्व भी संशयास्पद होने की संभावना बनी रहती है।
किंतु इस विषय पर सघन तथा परिपूर्ण अध्ययन के लिए इस किताब के प्रारंभिक/प्राथमिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता, बल्कि इससे इस विषय पर अधिक विस्तृत तथा तथ्यात्मक खोज और संशोधन के लिए सक्षम तथा विद्वान इतिहासकारों को एक, कमजोर ही सही, धरातल अवश्य उपलब्ध हो सकता है।
भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के, अबतक गुमनाम रखे गए, वीर राजे चिमणा बहादुर जैसे, पूर्व विदर्भ के इतिहास-पुरुष तथा महान स्वातंत्र्ययोद्धाओं की वीरता और बलिदान पर यह किताब, अल्प ही सही, प्रकाश डालती है। अतः उनका यह कार्य सराहनीय तथा उपयोगी अवश्य माना जा सकता है।
इस किताब के प्रकाशन हेतु INDIAN COUNCIL OF HISTORICAL RESEARCH (ICHR) द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। लेकिन इस ICHR को किसी भी तरह से 'भारत सरकार' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। गौरतलब है कि इस किताब को इस ICHR द्वारा भी कोई मान्यता प्राप्त नहीं है। बल्कि इसी किताब के अनुक्रमणिका के पूर्व के श्रेयनामावली के पृष्ठ पर नीचे स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि, ---
'THE PUBLICATION OF THIS BOOK HAS BEEN FINANCIALLY SUPPORTED BY THE INDIAN COUNCIL OF HISTORICAL RESEARCH. THE RESPONSIBILITY FOR THE FACTS STATED OR OPINIONS EXPRESSED IS ENTIRELY OF THE AUTHOR AND NOT OF THE COUNCIL."
इससे स्वयंस्पष्ट होता है कि इस किताब को मान्यता प्रदान करना तो दूर की बात है, इस किताब में वर्णित/लिखित FACTS तथा OPINIONS से भी ICHR का सहमत होना स्वीकार नहीं किया गया है। भारत सरकार की मान्यता का तो सवाल ही नहीं उठता।
स्पष्ट है कि इस किताब को भारत सरकार की भी कोई मान्यता प्राप्त नहीं है। फिरभी यह स्वयंघोषित महानुभाव अपने मिथ्यालापी तथा सत्योत्तर कथनों द्वारा, तथ्य तथा वस्तुस्थिती से अनभिज्ञ समाजजनों और पाठकों को, अपनी मिथ्या/सत्योत्तर व्हाॅट्सॲपीय और फेसबुकीय कथनों द्वारा बरगला कर अपना मिथ्या उदोउदो करने की कुटिलता में माहिर दिखाई देता है। उनकी इस मिथ्या महारत को उजागर करना आवश्यक हो गया है, ताकि उनके इसीतरह के अन्य मिथ्यालापों से भी समाजगण और अन्य पाठक भी बच सकें।
यह प्रतिभा के विकृत तथा विध्वंसक उपयोजन का एक उत्तम उदाहरण भी माना जा सकता है।
¤
@ॲड.एल.एम.कटरे,
गोंदिया. (10.07.2022)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Comments
Post a Comment