मुस्लिम तुष्टीकरण(?) : एक पैरेडाईम(Paradigm)
*मुस्लिम तुष्टीकरण(?): एक पैरेडाइम*
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अहिंसा, प्रेम, शांति और क्षमा—ये सिद्धांत किसी एकतरफ़ा रास्ते (One Way Traffic) की तरह नहीं हो सकते। इनका आधार हमेशा आपसी संवाद और समान प्रतिक्रिया के शाश्वत प्राकृतिक सिद्धांत पर होना चाहिए। वैज्ञानिक और कानूनी दृष्टि से भी देखें तो हर क्रिया में ही उसकी प्रतिक्रिया निहित होती है। लेकिन, 15 अगस्त 1947 के सत्ता-परिवर्तन के बाद के शासकों ने अपनी तत्कालीन और बाद की शासन-प्रणाली में इस सिद्धांत को लगभग समाप्त करने की नीति अपनाई।
असल में, सत्ता-परिवर्तन से पहले और उसके बाद के समय में, भीषण दंगों और भारी जन-हानि के माहौल के बावजूद, जिन्होंने भारतभूमि को अपना मानकर यहीं रहने का संकल्प लिया—ऐसे मुस्लिम बहुसंख्यकों को भारतीय संस्कृति में सहजता से शामिल किया जा सकता था। मेरा अध्ययन यही दर्शाता है। लेकिन सत्ता-परिवर्तन के बाद के शासकों ने इस प्राचीन भारतीय संस्कृति-प्रेरित अहिंसा, प्रेम, शांति और क्षमा की नीति को न्यायसंगत व प्राकृतिक रूप से अपनाने के बजाय, इन शाश्वत मूल्यों को नज़रअंदाज़ कर, कुछ गिने-चुने कट्टर मुस्लिम व्यक्तियों को ही बढ़ावा देने में ही अपनी “धर्मनिष्ठा” (?) मान ली। यह उस समय की ऐतिहासिक सच्चाई थी और आज भी है।
इस भेदभावपूर्ण और अकारण प्रवृत्ति के कारण, सत्ता-परिवर्तन के बाद के भारतीय शासकों ने जैसे इस विषय में पूरी तरह हाथ खींच लिए। यह बात किसी भी सच्चे भारतीय संस्कृति से जुड़े व्यक्ति के लिए अस्वीकार्य है। मा. हमीद दलवाई जैसे सच्चे मुस्लिम विचारकों को दरकिनार कर, उन्हें अनदेखा कर, गिने-चुने कट्टर मुस्लिम व्यक्तियों को सरकारी शक्ति उपलब्ध कराई गई—यह भी एक **कटुतम और उद्रेकजनक** सच्चाई थी और है।
असल में, मूल भारतीय संविधान में “मुस्लिम तुष्टीकरण” का कोई स्थान नहीं था, लेकिन सत्ता-परिवर्तन के बाद के भारतीय शासकों ने केवल एकमुश्त वोटों के स्वार्थ के लिए इसे बढ़ावा दिया।
तत्कालीन सच्चाई यह थी कि, जो मुस्लिम लोग धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान में जाने से इनकार कर भारत में ही रहने का विवेकपूर्ण निर्णय ले चुके थे, उनका मन हिंदू-मुस्लिम एकता और भारतभूमि के प्रेम से भरा था। ऐसे समय में, हमीद दलवाई जैसे विचारकों और विद्वानों को सरकारी समर्थन देना ज़रूरी और स्वाभाविक था। लेकिन भारतीय शासकों ने वह अनमोल अवसर गंवा दिया और भारतीय संविधान में भी न होने वाली, पुरानी और अप्रासंगिक बातें, कानून और प्रथाएं दोबारा निकालकर यह **कटुतम और उद्रेकजनक** स्थिति पैदा कर दी।
इसका वैज्ञानिक, कानूनी और प्राकृतिक परिणाम यह होना ही था कि—आज नहीं तो कल—कठोर प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी। मानवीय दृष्टिकोण से ऐसी प्रतिक्रियाओं को भड़काना या बढ़ावा देना ग़लत और अमानवीय है, और भारतीय संस्कृति में भी यह स्वीकार्य नहीं है। लेकिन प्रकृति के नियम ऐसे किसी भी मानवीय या अमानवीय प्रवृत्ति से परे होते हैं। इस सच्चाई को नकारकर, उसका एकतरफ़ा और पक्षपाती विश्लेषण करना मेरी वैज्ञानिक, कानूनी और प्राकृतिक सोच के विपरीत है।
इसका मतलब यह कतई नहीं कि मैं मुस्लिम विरोधी हूँ या रहा हूँ। उल्टा, मेरे निजी अनुभव में मेरे मुस्लिम मित्रों में मुझे ऐसा कोई सत्ता-परिवर्तन बाद का कट्टर तुष्टीकरण भाव नहीं मिला। छात्र-जीवन में लगभग 6–7 साल तक मैं एक मुस्लिम परिवार के घर में किराए से रहा। उस परिवार की मुखिया, जिन्हें मैं “अम्माजी” कहता था, उन्होंने मुझे अपने बेटे जैसा स्नेह, प्रेम और सम्मान दिया। घर में मेरा नाम ‘बड़ाभाऊ’ था, और अम्माजी हमेशा मुझे इसी नाम से पुकारती थीं। घर में खास अवसरों पर बनने वाले शाकाहारी व्यंजनों में मेरा भी पूरा अधिकार था। परिवार के मुखिया अब्बाजी को भी मुझसे बहुत लगाव था। मेरे साथ भोजन व्यवस्था के लिए पिता ने एक सेवक भी रखा था, लेकिन जब कभी वह सेवक नहीं होता था, तो रात में अकेलापन या डर न लगे, इसके लिए अब्बाजी मेरे कमरे के सामने वाले बरामदे में चारपाई डालकर सोते थे। अब अम्माजी और अब्बाजी, दोनों ही नहीं रहे, लेकिन उनके बच्चे और परिवार आज भी उतना ही स्नेह और अपनापन रखते हैं। आज भी दोनों परिवारों के बीच आत्मीय संबंध बने हुए हैं। यहाँ तक कि मेरी विभिन्न निवेश योजनाओं के अभिकर्ता (एजेंट) भी मेरे एक मुस्लिम मित्र हैं, जिनसे मेरा गहरा मित्रतापूर्ण रिश्ता है।
ऐसे सच्चे मुस्लिम व्यक्तियों को बढ़ावा देने में सत्ता-परिवर्तन के बाद के भारतीय शासक असफल रहे। इसका प्रभाव इतना गहरा था कि मुझे, “मैं हिंदू हूँ और मंदिर में जाकर पूजा करता हूँ” यह खुलकर कहने में भी संकोच होता था। यह इस तुष्टीकरण नीति का भारतीय जनमानस पर पड़ा स्पष्ट असर है।
अगर इस स्थिति पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया सामने आती है, तो उसे कैसे संभालना है, यह अध्ययन का विषय है। प्रतिक्रिया को बढ़ावा भले ही न दिया जाए, लेकिन उसका समाधान अहिंसा, प्रेम, शांति और क्षमा के सिद्धांतों का सही उपयोग करके ही किया जाना अनिवार्य और स्वाभाविक है—यह मेरा विनम्र मत है।
इतनी स्पष्ट, हाल के इतिहास से प्रमाणित, **कटुतम और उद्रेकजनक** सच्चाई होने के बावजूद, इसके प्रभाव का उल्लेख अधिकांश तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष” व्यक्तियों के लेखन, विचार या आचरण में नहीं मिलता। उल्टा, उनके लिखे और सोचे में हर कदम पर “मुस्लिम तुष्टीकरण” की गंध आती है।
......और यही कारण है कि मैं इस विषय पर जानकारों और शोधकर्ताओं के विचार जानना चाहता हूँ, ताकि मैं अपने ऊपर दिए गए विचारों को संविधान की संबंधित धाराओं के आलोक में परख सकूँ।
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@ॲड.लखनपाल सिंह कटरे
बोरकन्हार-441902, जि. गोंदिया
(15.07.2025)
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