बढ़ती नकारात्मकता का बढ़ता प्रसार
छह साल पुरानी मेरी एक अनदेखी मराठी पोस्ट का हिंदी अनुवाद फिर से साझा कर रहा हूँ...!
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*“बढ़ती नकारात्मकता का बढ़ता प्रसार”*
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दि.11 अप्रैल 2019 के (मराठी अखबार) “लोकसत्ता” में दिगंबरजी शिंदे का लेख "वाढत्या नकारात्मकतेचे वय..." [“बढ़ती नकारात्मकता की उम्र...”] पढ़ा, जो भविष्य में आने वाली गंभीर घटनाओं की चेतावनी देता है।
दिगंबरजी ने इस चिंताजनक लेख में लिखा है कि, — “भारतीय लोकतंत्र अब सातवें दशक में प्रवेश कर चुका है, लेकिन कर्तव्य के प्रति जो उदासीनता है और अधिकारों के प्रति जो जरूरत से ज्यादा जागरूकता है, उसके बीच संतुलन लाने का कोई प्रयास होता नहीं दिखता।” --- इसके बाद उन्होंने स्पष्ट और तार्किक विश्लेषण करते हुए यह कटु सच्चाई रखी— “पेट पालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है—यह बात आज की (युवाओं की) समझ से बाहर हो चुकी है।” यहीं से उन्होंने सवाल उठाया— “जो नकारात्मकता आमतौर पर बुढ़ापे या रिटायरमेंट के बाद आती है, वह आज इतनी कम उम्र में कैसे आ गई?”
मैं खुद फरवरी 2013 में रिटायरमेंट के बाद पिछले साढ़े बारह साल से अपने गाँव (जनसंख्या लगभग 2350) में रह रहा हूँ। इससे पहले करीब 40 साल जिला परिषद शिक्षक से लेकर महाराष्ट्र सरकार के वरिष्ठ राजपत्रित अधिकारी तक का अनुभव लिया है — महाराष्ट्र के ज़्यादातर हिस्सों में, तालुका और जिला स्तर से लेकर मेट्रो शहरों तक, सिवाय कोंकण और ख़ानदेश के। यह सब जीने और समझने के बाद मैं फिर गाँव का निवासी बन गया।
इन साढ़े बारह वर्षों में मैंने देखा है कि विकृत राजनीति ने हमारे सात दशक पुराने लोकतंत्र को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। अब तो गाँव-गाँव में गांजा-दारू की लत और दबंगई आम बात हो चुकी है। इसके अलावा, अधिकतर ग्रामीण अब किसी भी मेहनत या श्रम के बिना, घर बैठे मिलने वाले मुफ्त राशन और दूसरी सरकारी सुविधाओं के “लाभार्थी” बन गए हैं। नतीजा वही है जो दिगंबरजी ने लिखा—“कर्तव्य के प्रति उदासीन, लेकिन अधिकारों के प्रति जरूरत से ज्यादा जागरूक।” वे पेट पालने के लिए मेहनत करने के उस बुनियादी, प्रकृति-निर्धारित नियम की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।
मुझे मालूम है कि यह #BitterReality ज़्यादातर तथाकथित कट्टर मानवाधिकारवादी विचारकों को पचाना मुश्किल लगेगा। वजह साफ़ है—आजकल वे लोग हावी हैं जो पहले से तय लक्ष्य और निष्कर्ष के हिसाब से, बहुत छोटे-से सैंपल सर्वे के द्वारा, “गरीबी”की खोज में निकलते हैं और अपनी इसी खोज को प्रसारित करते रहते है। सच में/वास्तव में गाँव में रहकर, अपनी असली पहचान छुपाकर, कम से कम तीन साल गाँव में बिताने के बाद ही असली गरीबी की #BitterReality समझी जा सकती है। शहर में ए.सी. कमरे में रहने वाले, थोड़ी-सी “चर्चा” करके, दूर से नज़र डालने वाले, कथित सर्वेक्षक या शोधकर्ता इसे कभी नहीं समझ सकते—यह कड़वी सच्चाई है।
दिगंबरजी के अनुसार, ब्रिटिशकालीन शिक्षा पद्धति भारतीय संदर्भ में सिर्फ असफल ही नहीं, बल्कि असंबद्ध भी है—और आज की भयावह बेरोजगारी ने इसे साबित कर दिया है।
स्वतंत्रता के बाद, पहली आधिकारिक लोकसभा बनने से पहले ही, अंतरिम लोकसभा के अंतरिम प्रधानमंत्री ने भारतीय संविधान में (संविधान स्वीकृति के सिर्फ 15 महीने बाद, 18 जून 1951 को) जो प्रथम संशोधन किया, उसने भारतीय अर्थव्यवस्था—जो आज भी मुख्यतः ग्रामीण और कृषि-आधारित है—को कमजोर करने का काम किया। (कोरोना काल ने ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था के महत्व को पूरी तरह साबित और अधोरेखित भी कर दिया है।)
फिर भी, 18 जून 1951 के उस प्रथम संवैधानिक संशोधन के परिणाम, पिछले सात दशकों से भारतीय अर्थव्यवस्था को परावलंबी बनाने का “महान कार्य”(?) करते आ रहे हैं। भारतीय संदर्भ में, जहाँ आज भी 60–70% से अधिक जनसंख्या कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में संलग्न/रत रहकर जीवनव्यापन करती है, और जहाँ रोजगार की स्थानीय व पर्याप्त क्षमता मौजूद है—उसी क्षेत्र की उपेक्षा करने के कारण, दिगंबरजी द्वारा बताई गई भयावह और विनाशकारी नकारात्मकता की जड़ें जम रही हैं।
इसके अलावा, हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था भी इस नकारात्मकता को और बढ़ावा दे रही है, जिसके दुष्परिणाम अब खतरनाक रूप में सामने आ रहे हैं—यह बात सबको मालूम है, लेकिन बोलते/लिखते बहुत कम लोग है!।
इस #BitterReality का इतना सुंदर और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए मैं दिगंबरजी और “लोकसत्ता” नागपुर के संपादक महोदय का हृदय से आभारी हूँ और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
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@ॲड. लखनसिंह कटरे
बोरकन्हार (झाड़ीपट्टी)-441902,
जिला गोंदिया
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