शिक्षक दिवस : एक विचार मेरा भी!

*शिक्षक दिवस : एक विचार मेरा भी !*
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>> अक्तूबर 1978 से अप्रैल 1984 तक, लगभग छह वर्ष, मै तत्कालीन जिला परिषद भंडारा के शिक्षा विभाग के अंतर्गत गणित-विज्ञान शिक्षक की हैसियत से कार्यमग्न(!?) रहा हूँ। इस दरमियान मै शहीद जान्या तिम्या जिला परिषद हाईस्कूल तथा ज्युनिअर काॅलेज, गोरेगाव (एक शैक्षणिक सत्र), जिला परिषद हाईस्कूल तथा ज्युनिअर काॅलेज, देवरी (पांच शैक्षणिक सत्र) तथा इसी बीच जिला परिषद हाईस्कूल, कट्टीपार (आठ दिन) यहाँ शिक्षक होने का फ़र्ज निभाता(!) रहा हूँ। 

>> इन लगभग छह शैक्षणिक सत्रों में मैने करीबन 2500-3000 छात्र-छात्राओं को पूरी तरह बिगड़ने/बिगाड़ने(?) में यथासंभव सहायता की है। देवरी में कार्यमग्न(?) रहते वक्त तत्कालीन प्राचार्य-कम-मुख्याध्यापक श्री.ज्ञानेश्वर झा तथा (दिवंगत) श्री.जगदीश मिश्रा इनके आदेश-कम-सूचना को मद्देनजर रखते हुए मुझे पाँचवी से आठवी कक्षा के छात्र-छात्राओं को गणित एवं भोतिकी ये दोनों विषय मराठी, हिंदी और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने(?) का सुअवसर मिला। इन्हीं दो महानुभावों के प्रेमादेश से मुझे नौवीं से बारहवीं तक की कक्षाओं में मराठी माध्यम में मेरे मूल विषय गणित और भौतिकी के अलावा आदेशानुसार सभी (कोई भी!) विषय पढ़ाने(?) का भी सुअवसर मिला। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मैने पाँचवी से बारहवीं तक की कक्षाओं के छात्र-छात्राओं को बिगड़ने/बिगाड़ने(?) मे पूरी सहायता की है। 

>> मै एक बात स्पष्ट कर दूँ कि "मैने पढ़ाया" इस वाक्यांश का अर्थ "मैने कुछ सिखाया" यह न लिया जाए। क्योंकि मेरी अल्पमतीका सोचना/मानना यह रहा है कि इस संसार में कोई भी किसी को भी कुछ भी "सिखा(!)" नही सकता। "सिखना" यह स्वयंप्रेरित और स्वसंभव संकल्पना है। यदि कोई शिक्षक चाहे तो "पढ़ना चाहने वाले" विद्यार्थीको सिर्फ मार्ग दिखा/बता सकता है। उस मार्ग पर चलना/नही चलना, उस मार्ग का अनुसरण करना/नही करना यह तो मानव-संस्कृति में हमेशा स्वयंप्रेरित ही रहा है/माना गया है। 

>> भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अठारह अध्याय तक "सबकूछ" बताते रहते हैं, अर्जुन की शंका-कुशंकाओं का निवारणादि करते है। लेकिन अंत में अठारहवे अध्याय के श्लोक 63 में अर्जुन से कहते हैं, "यथेच्छसि तथा कुरू"। उसी तरह विदेह राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के संवादात्मक "अष्टावक्र गीता" में भी ऋषि अष्टावक्र राजा जनक से यही वाक्यांश -- यथेच्छसि तथा कुरू -- कहते हैं। इतनाही नही भारतीय संस्कृति के एक महानतम तत्त्वज्ञ तथा नवप्रवाह के उद्गाता भगवान गौतम बुद्ध भी कहते हैं कि, "अत्त दीप भव"। इन सबका सार, मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार यही होता है कि हर इंसान को अपना मार्ग स्वयं चलकर ही पार करना होता है। मार्गदर्शन मिलने पर उसका सही/उचित अनुसरण और अनुपालन स्वयं उस इंसान की स्वयंप्रेरित प्रेरणा ही होती है। 

>> अतः जिन छात्र-छात्राओं को मैने उपरोक्त कालावधी मे "पढ़ाया(?)" उनसे यही प्रार्थना(!) करूँगा कि उनकी प्रगति और खुशहाली (या अन्यथा) के निर्माता वे स्वयं है। इस में मेरा रत्तीभर भी श्रेय नहीं है। अलबत्ता इस प्रक्रिया में मुझे बहुतों (छात्र-छात्राओं) के लिए बहुत कठिन शिक्षा (सजा?) का भी अवलंब करना पड़ा था, मेरे उस शिक्षा-क्रिया से प्रताड़ित(?) किसी छात्र-छात्रा को मुझसे शिकायत हो तो मै आज, इस शिक्षक दिवस के अवसर पर, उनका क्षमाप्रार्थी हूँ। क्षमस्व। 🙏🙏
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@ॲड.लखनसिंह कटरे 
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया 
(05 सितम्बर 2020)
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