परिवर्तन : एक कोलाज

*परिवर्तन : एक कोलाज*
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         जो लोग किसी भी प्रकार के परिवर्तन या बदलाव के खिलाफ नकारात्मक बातें करते हैं, वे वास्तव में वास्तविकता को नकारकर अपने ही पूर्वाग्रहों और कल्पनाओं में जीते हैं। जब भी कोई व्यक्ति या समाज किसी बड़े परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो उसे तथाकथित “आचरट स्थिति-वादी” — यानी कट्टर यथास्थितिवादियों का विरोध झेलना ही पड़ता है। ऐसे विरोधियों के तर्क सतही होते हैं — वे केवल मौजूदा व्यवस्था को जस की तस बनाए रखने की बात करते हैं। वे यह नहीं सोचते कि हम किस बात का समर्थन कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, या जिस बदलाव को हम नकार रहे हैं, उसके परिणाम क्या हो सकते हैं। उनके मन में यह प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए वे भोले स्वर में पूछते हैं — “अभी की व्यवस्था में बुरा क्या है?”
       असल में, जब कोई व्यक्ति परिवर्तन के मूल उद्देश्य को समझना ही नहीं चाहता, तो ऐसे प्रश्न स्वाभाविक हैं। ऐसे लोग अक्सर बदलाव समर्थकों के “छिपे हुए स्वार्थों” की बातें फैलाकर मुद्दे को भटकाते हैं और द्वेष से प्रेरित विरोध का वातावरण बनाते हैं।
       संपूर्ण ब्रह्मांड में यदि कोई एक चीज शाश्वत है, तो वह परिवर्तन ही है — यह सर्वमान्य सिद्धांत है। हर सिद्धांत मानव की विश्लेषणात्मक बुद्धि का परिणाम होता है, और यह विश्लेषणात्मक बुद्धि केवल मनुष्य के पास है। इसलिए, किसी भी मानवीय क्रिया या सिद्धांत का अलग-अलग दृष्टिकोणों से विश्लेषण करना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से देखें तो परिवर्तन के पक्षधर और विरोधी के बीच होने वाला विवाद या चर्चा ज्ञान की प्रक्रिया का एक आवश्यक भाग है। इससे विचारों का विकास होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इससे कोई “पूर्ण सत्य” प्राप्त हो जाएगा। यही विचार उत्तर-आधुनिक चिंतन का मूल आधार है।
        ऐसे में परिवर्तन से जुड़ी बहसें ज्ञान-वृद्धि का माध्यम बननी चाहिए। लेकिन कट्टर यथास्थितिवादी इन बहसों को द्वेष, अहंकार और आकस में फँसाकर केवल विरोध का माध्यम बना देते हैं। वे परिवर्तन पर तार्किक चर्चा करने की बजाय मूल मुद्दे को भटका देते हैं।
        परिवर्तन की संकल्पना को ठीक से समझने के लिए हमें संस्कृति और विचारधारा के घनिष्ठ संबंध को समझना जरूरी है। संस्कृति, जो मानव जीवन से गहराई से जुड़ी है, हमारे विचारों और सामाजिक संबंधों को आकार देती है। इन्हीं संबंधों से सांस्कृतिक आचार, नियम और आदर्श उत्पन्न होते हैं। धीरे-धीरे समाज में यह धारणा बनती है कि कुछ परंपराएं “आदर्श” या “नियमित” हैं, जबकि बाकी सब “अलग” या “असामान्य” हैं। यदि हम मानवीय सभ्यता की इस मूल संरचना को नहीं समझते, तो परिवर्तन के अपरिहार्य स्वरूप को भी नहीं समझ सकते। 
        यथास्थितिवादी जब अपनी छद्म विद्वता के बल पर परिवर्तन का विरोध करते हैं, तो वास्तविक परिवर्तन समर्थकों को विचलित नहीं होना चाहिए। उन्हें वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से इस प्रक्रिया का मूल्यांकन करना चाहिए।
        सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक वास्तविकताएं समय के साथ बदलती हैं — और स्थान के अनुसार भी। एक समाजशास्त्री के अनुसार, आने वाले समय में एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कम से कम पाँच से छह बार नौकरी बदलनी पड़ेगी। इसका मतलब है कि काम का स्वरूप ही बदलता रहेगा। प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए हमें “पुराना छोड़ना” और “नया अपनाना” लगातार सीखना होगा। भविष्य में परिवर्तन स्वीकारना केवल व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं रहेगा; यह समाज और सभ्यता तक फैलेगा।
         इसका अर्थ यह है कि “आदर्श” या “नियमित” समझे जाने वाले मूल्य भी समय और स्थान के अनुसार बदलते हैं। इसलिए उनमें होने वाले परिवर्तन स्वाभाविक और प्रकृति-संगत हैं।
        लेकिन ऐसे स्वाभाविक परिवर्तनों का विरोध करने वाले कट्टर यथास्थितिवादी अपने तर्कहीन, द्वेषपूर्ण और खोखले कारणों की ढाल लेकर परिवर्तन पर हमला करते हैं। कभी-कभी उनका यह हमला अल्पकालिक रूप से प्रभावशाली भी हो जाता है, और कुछ लोग उनके भ्रम में आ जाते हैं। ऐसे समय में, परिवर्तन के समर्थकों का कर्तव्य है कि वे इन तर्कहीन दलीलों का तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतिवाद करें — यही आवश्यक है।
       अंततः, परिवर्तन या बदलाव एक प्रकृति-नियंत्रित और प्रकृति-संगत प्रक्रिया है। इसलिए इसे यथास्थितिवादियों के द्वेषपूर्ण और असंवेदनशील रवैये की गिरफ्त से मुक्त रखकर, इसके मार्ग को सुगम, संतुलित और फलदायी बनाने के लिए सामंजस्यपूर्ण और विवेकपूर्ण जनचेतना की लोकचळवळ (जन-आंदोलन) की आवश्यकता होती है। यही इस युग का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
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(संदर्भ आभार : ‘लोकसत्ता’ मराठी दैनिक अखबार, 21.10.2022 और ‘सजग’ मराठी त्रैमासिक पत्रिका, जुलै-सितंबर 2022)
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@ॲड. लखनसिंह कटरे,
बोरकन्हार, जिला गोंदिया 
(दि. 22.10.2022) 
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