पोवार समाज और पोवारी बोली : इतिहास, वर्तमान और भविष्य - एक संक्षिप्त आकलन

*पोवार समाज और पोवारी बोली : इतिहास, वर्तमान और भविष्य – एक संक्षिप्त आकलन*
@ॲड. लखनसिंह कटरे 
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       पोवार समाज और उसकी पोवारी बोली — ये दोनों हमारे अतीत की एक गौरवशाली और प्राचीनतम स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शूरवीर पूर्वजों और विभिन्न राजघरानों से जुड़े पोवार समाज की उत्पत्ति का सटीक और पूर्ण इतिहास आज भी इतिहास के गर्भ में छुपा हुआ है।
        हमारे कुछ पूर्वजों ने हमारे इतिहास को खोजने के बहुत ही सराहनीय प्रयास किए हैं। आज भी हमारे समाज के कुछ अधिकृत विद्वान और इतिहास के शोधकर्ता, हमारे इतिहास की खोज में निष्ठा और समर्पण से जुटे हुए हैं। पोवार समाज के इतिहास को सामने लाने वाले कुछ शोधपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन भी हो चुका है। (हालाँकि, कुछ छद्म पहचान वाले लोग इस विषय पर संदिग्ध और अप्रमाणिक लेखन भी कर रहे हैं — लेकिन इतिहास में ऐसे दो-चार व्यक्ति हमेशा होते आए हैं और आगे भी रहेंगे। ऐसे लोगों को नज़रअंदाज़ करना ही होगा, यदि हम सच्चे और प्रमाणित इतिहास को समझना चाहते हैं!)
         कोई भी समाज का इतिहास एक निश्चित ठहराव नहीं होता, वह एक सतत प्रक्रिया का परिणाम होता है। किसी भी समुदाय के वस्तुनिष्ठ इतिहास को जानने हेतु तत्कालीन हस्तलिखित पांडुलिपियाँ, शिलालेख, ताम्रपत्र, बखर या भाट साहित्य, प्रचलन के माध्यम, वस्तु-विनिमय आदि को समग्र रूप में विश्लेषित करने वाली निष्पक्ष एवं पूर्वग्रह-मुक्त दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
          हमारे समाज के कुछ पूर्वज विद्वानों ने इस दृष्टिकोण से अध्ययन किए हैं, जो आज के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत लाभदायक और उपयोगी साबित हो रहे हैं। इनके अध्ययन आज के अनुसंधानकर्ताओं को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। यदि उनके कार्य में कोई कमी या त्रुटि रही हो, तो उसे सुधारना भी संभव होता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम उनके कार्यों को कमतर आँकें, बल्कि आज के अध्ययनकर्ताओं को उनके कार्य को आधार मानकर आगे बढ़ना चाहिए और उनके प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए।
         यदि हम पोवार समाज की ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का सही आकलन करना चाहते हैं, तो हमें उसकी मूलभूत बोली — पोवारी बोली — के इन सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा। क्योंकि किसी भी समाज की संस्कृति का सही आकलन उसकी भाषा-बोली के ऐतिहासिक ‘उत्खनन’ और भाषिक अध्ययन के बिना सम्भव नहीं है।
         इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो वर्तमान समय के भाषाविदों को अद्यतन ध्वनिशास्त्र (Phonetics) और भाषाशास्त्र (Linguistics) की आधुनिक अवधारणाओं के आलोक में पोवारी बोली का अध्ययन प्राथमिकता से करना अनिवार्य हो जाता है।
        हमारे समाज की पहचान 'पौर', 'प्रमार', 'परमार', 'पोवार', 'पंवार', 'पवार' आदि संज्ञाओं से की जाती रही है। इन नामों के उच्चारणों और रूपों का भाषाशास्त्रीय अध्ययन करते हुए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन विभिन्न संज्ञाओं का एक ही मूल है और यह अध्ययन भाषा-विकास की दिशा को स्पष्ट करने में सहायक हो सकता है।
       इस क्षेत्र में हमारे समाज के अनेक विद्वानों ने ऐतिहासिक कार्य किए हैं। विशेष रूप से डॉ. ज्ञानेश्वर टेंभरे और डॉ. तूफानसिंह पारधी जैसे शोधकर्ताओं का योगदान उल्लेखनीय है। यह हमारे समाज के लिए गर्व की बात है।
       दिनांक 04 नवम्बर 2018 को नागपुर में पोवारी बोली के इतिहास में पहली बार, "अखिल भारतीय पोवारी बोली साहित्य, कला, संस्कृति मंडल" की औपचारिक स्थापना की गई, जिससे पोवारी बोली के पुनरुत्थान और पुनर्जीवन का कार्य प्रारंभ हुआ। इसका फल यह हुआ कि हम अब फरवरी 2025 में पाँचवाँ अखिल भारतीय पोवारी बोली साहित्य सम्मेलन भी यशस्वी कर सके हैं।
        मंडल के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. ज्ञानेश्वर टेंभरे, उपाध्यक्ष एड. लखनसिंह कटरे, सचिव एड. देवेंद्र चौधरी तथा अन्य संस्थापक पदाधिकारीगणों द्वारा पोवारी बोली में विविध साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित की गई हैं, जिनमें से कुछ अब अमेज़न जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर भी उपलब्ध हैं।
         इस मंडल के माध्यम से अब तक पाँच अखिल भारतीय संमेलनों का आयोजन हो चुका है, जिससे छिपे हुए प्रतिभाशाली पोवारी साहित्यकार, कलाकार, और सांस्कृतिक रक्षक सामने आए हैं।
          साहित्य, कला और अनुसंधान के क्षेत्र में डॉ. तूफानसिंह पारधी, डॉ. राम चौधरी, डॉ. शोभा बिसेन, डॉ. अलका चौधरी, डॉ. प्रल्हाद हरिणखेडे, डॉ. भारती शरणागत, इं. सुरेश देशमुख, इं. गोवर्धन बिसेन, छगनलाल रहांगडाले, रविंद्र टेंभरे, युवराज हिंगवे, वंदना कटरे, दीपलाल परिहार, सौ. लक्ष्मी पटले, सी.एच. पटले, रामचरण पटले, चिरंजीव बिसेन, यादोराव चौधरी, उषाताई पटले, एच.पी. बिरगडे, दिलीप हनवत, डिलेश्वर बोपचे, उमेंद्र युवराज बिसेन, दिनदयाल पारधी, पंकज टेंभरे 'जुगनू', सनम पटले, पूनम पटले, मेघश्याम बिसेन, मंगल चौधरी, देवेश पटले, इं. यमन पटले, अजाबलाल बिसेन, महेन्द्र रहांगडाले, उदयसिंह पटले, तुकाराम किनकर, हिरालाल बिसेन, रमेश पटले, शारदा चौधरी... और भी कई दर्जनों नाम उल्लेखनीय हैं, जिनके साहित्यिक कार्य, अनुसंधान कृतियाँ, और कलाकृतियाँ सामने आई हैं।
           एक अनुमान के अनुसार, 1900-1910 के बीच पोवारी बोली में आधुनिक रचनात्मक प्रवृत्तियों की शुरुआत मानी जा सकती है। यद्यपि प्रारंभिक दौर में यह मौखिक रहा, लेकिन धीरे-धीरे पोवारी बोली की रचनाएँ लिखित स्वरूप में आने लगीं। इस विषय पर और अधिक गहन शोध की आवश्यकता है। फिर भी, इस ऐतिहासिकता को नकारा नहीं जा सकता। जैसे कि स्व. जयपालसिंह पटले, स्व. एड. मनराज पटले जैसे साहित्यकारों ने पोवारी बोली के लिखित साहित्य का प्रारंभिक इतिहास रचा है।
         आज कुछ तथाकथित छद्म-अभ्यासक और लेखकीय महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि इस विषय पर अब जाकर उन्हीं ने कार्य शुरू किया है। इससे वे युवा पीढ़ी को गुमराह कर रहे हैं। यह इतिहास के छद्म, विकृत और भ्रमजनक रूप को बढ़ावा देने वाला प्रयास है।
       इसलिए युवा पीढ़ी को सतर्क होकर स्वयं अध्ययन करना चाहिए, जिससे कि पोवार समाज और पोवारी बोली के सही इतिहास की पहचान हो सके। क्योंकि केवल 'स्व-अध्ययन' ही सच्चे इतिहास को सामने ला सकता है और विकृत तथ्यों को समाप्त कर सकता है।

जय पोवार समाज!
जय पोवारी बोली!
जय राजा भोज!
@ॲड. लखनसिंह कटरे
बोरकन्हार-441902, जिला गोंदिया
(पुनर्लेखन दिनांक : 10.09.2024)
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