पोवार : एक श्रेष्ठतम, प्राचीनतम ऐतिहासिक समाज
*पोवार : एक श्रेष्ठतम, प्राचीनतम ऐतिहासिक समाज*
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वर्तमान में पोवार समाज मुख्यतः महाराष्ट्र के विदर्भ अंचल के झाडीपट्टी (गोंदिया, भंडारा, चंद्रपूर, नागपूर जिलों में) और मध्यप्रदेश के बालाघाट, सिवनी, छिंदवाडा जिलों में ही बहुतायत में, स्थायी रूप से पाया जाता है। (वैसे आज की वस्तुस्थिती यह है कि हमारा पोवार समाज अब भारत के सभी बड़े शहरों में विविध विधाओं/कलाओं/व्यवसायों के निमित्त स्थायित्व धारण किए हुए है। इतना ही नहीं, विदेशों में भी पोवार समाज के सुबुद्ध जन अपना सजग और सक्षम अस्तित्व स्थापित कर चुके है।) इतिहासकार कहते है कि, मूलतः यह पोवार समाज मालवा/धार का बाशिंदा हुआ करता था। लेकिन सम्भवतः मुस्लिम आक्रामकों/आक्रांताओं द्वारा आहत होकर पोवार समाज के योद्धा अपने दलबलसहित, आजसे लगभग तीन सौ साल पहले, मालवा/धार से, नागपूर के तत्कालीन भोंसलों द्वारा शासित क्षेत्र में, (जिसे बाद में अंग्रेजो ने अपने शासन काल में, सी.पी.एण्ड बेरार मतलब सेन्ट्रल प्राॅव्हिन्स एण्ड बेरार/मध्य प्रांत और वऱ्हाड का नाम दिया था) स्थलांतरित होकर नगरधन(रामटेक) होते हुए इस क्षेत्र की बारमासी प्रवाहित नदियां, वैनगंगा और बाघ नदी के अंचल में बस गए। बदलते समय की धारा पहचानकर सफल योद्धा से सफल किसान होने की प्रक्रिया का अंग बन गए।
ऐसे इस पोवार समाज का एक प्राचीनतम परंतु अभीतक अनबुझसा श्रेष्ठतम इतिहास है। इनके इस प्राचीनतम ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का पूर्ण रूपेण संशोधन अभी भी होना बाकी/शेष है। उसी तरह इस प्राचीनतम पोवार समाज के मूलपूरुष-नारी की उत्पत्ति का साधार एवं सर्वमान्य ऐतिहासिक संशोधन होना भी अभी शेष है। पोवारों की उत्पत्ति के संदर्भ में प्रचलित आबू पर्वत पर किए गए यज्ञ की अवधारणा तथा आबू पर्वत के ही निकट की, फिलहाल अस्तित्वशून्य हो चुकी, पोवारों की कथित राजधानी चंद्रावती नगरी के अस्तित्व का पूर्ण रूपेण संशोधन और प्रस्थापन होना अभी शेष है। लेकिन इस LGP/उजाखो*त्तर के बदलते माहौल में सभी जाती समूहों/समाजों को अपना मूल जानने की चाह बलवती होने से अब इस पोवार समाज के भी सभी पहलूओं का/पर सटीक ऐतिहासिक संशोधन और प्रस्थापन होना अनिवार्य जान पड़ता है।
पौर, प्रवर, परमार, प्रमार, प्रमर, पोवार, पँवार, पवार यह सभी शब्द-विशेष तथा संकल्पनाएँ अपने-अपने भाषाशास्त्रीय और उच्चारशास्त्रीय संकल्पनाओं के विज्ञानाधारित संशोधन/अध्ययन की आस लिए अपने वास्तविक तथा मूल स्वरूप को खोजने हेतू हर सुबुद्ध पोवार बंधु-भगिनी को उद्युक्त करते है।
अभीतक ज्ञात इतिहास को देखा जाए तो हर पोवार व्यक्ति महाराजाधिराज विक्रमादित्य, महाराजा पोरस(पुरू) तथा चक्रवर्ती राजा भोज को अपना पूर्वज तथा आदर्श मानते है। किंतु महाराजाधिराज विक्रमादित्य, पोरस और राजा भोज को अपना पूर्वज और आदर्श मान लेने मात्र से हम सच्चे पोवार तथा विक्रमादित्य, पोरस और भोज के वास्तविक वंशज कहलाने में समर्थ या सक्षम नहीं हो जाते। उसके लिए हमें विक्रमादित्य, पोरस और राजा भोज के वास्तविक पराक्रमों तथा तद्भव एकसूत्रीभाव के साथ साथ राजा भोज द्वारा विभिन्न विषयोंको घेरते हुए रचित 84 विद्वतापूर्ण ग्रंथोंको तथा उनके सभी युद्धों में सदा अजेय होने के वास्तविक रहस्य को जान/समझ लेना भी अत्यावश्यक रूप से अनिवार्य हो जाता है। उसीतरह विक्रमादित्य और पुरू(पोरस) इन ऐतिहासिक पुरुषोंका पोवार होने, हमारे पूर्वज होने के बारेमें पाश्चात्य (फ्रेंच, पोर्तुगिज, डच और अरबी) संशोधकों तथा इतिहासकारों के तत्कालीन ग्रंथो एवं तद्जनित कथनों/संशोधनों की अद्ययावत सक्षम वैज्ञानिक साधनों तथा प्रक्रिया द्वारा खोजजन्य परख भी क्रमप्राप्त हो जाती है। इस विषय में हमारे समाज के कुछ साहसी, सुबुद्ध एवं सजग युवा संशोधक अध्ययन तथा संशोधनात्मक कार्य कर रहे है, यह हमारे समाज के ऐतिहासिक तथ्यों के प्रतिपादन एवं जानकारी हेतू बहुतही लाभदायक तथा गौरवपूर्ण बात है।
किसी भी अधूरी जानकारी को पूर्ण जानकारी मान/समझकर निष्कर्ष निष्पादित करना तथा उसी को एकमात्र आधार मानकर अनभ्यास टिप्पणी करना यह अध्ययन तथा संशोधन की गहन तथा कष्टसाध्य प्रक्रिया से दूर भागकर अपनी ओछी हरकत दिखाने जैसा माना जाता है। अतः हमे हमारे इन युवा संशोधकों तथा इतिहासकारों की हौसलाअफजाई करनी होगी, ताकि ये पोवार समाज के श्रेष्ठतम इतिहास की सही-सही/पूर्णरूपेण खोज करने में सक्षम तथा समर्थ भी हो सकें। अध्ययन/संशोधन करने की क्षमता न होना या अध्ययन/संशोधन के लिए आलस्य करना यह दुर्गुण हमे हमारे सच्चे एवं श्रेष्ठ लक्ष्य से भटका सकता है, और ऐसी वृत्ती का अंगीकार करने से हम 'अधजल गगरी छलकत जाए' वाली कहावत को चरितार्थ करने लगते है। अतः हमे अध्ययन/संशोधन करते वक्त सावधान, सजग तथा प्रमुखतः खुले दिमाग वाला होना/रहना अनिवार्य हो जाता है।
कभी कभी किसी प्रासंगिक विषय पर 'चलते-चलते' भी की गई टिप्पणी से रूबरू/अवगत होने हेतू हमे उस प्रसंग, वस्तुस्थिती तथा टिप्पणी की वास्तविकता और प्रासंगिकता को अपने अध्ययन द्वारा समझ/जानकर ही उसपर अपनी राय व्यक्त करना यह सच्चे अध्ययनकर्ता/संशोधक का प्राथमिक कर्तव्य होता है। किसी वक्तव्य या प्रसंगवश की गई किसी अल्पांश टिप्पणीपर संदर्भशून्य/संदर्भरहित तथा द्वेषभारित कल्पनाओं के वशीभूत होकर व्यक्त होना यह क्षणभर के लिए अच्छा भी लग सकता है, लेकिन वस्तूतः यह तथ्यों तथा रहस्यों से भागकर अपनी अनभ्यास-वृत्ती, अज्ञानता/मूर्खता छिपाने का एक असफल बहाना/प्रयास मात्र होता है, जो अंततः ऐतिहासिक संशोधन की प्रक्रिया में बाधक साबित होता है। अतः हमे अध्ययन तथा संशोधन/खोज करते वक्त/करते हुए बहुतही सावधान, सजग तथा निरपेक्ष और निष्पक्ष/तटस्थ भाव से अपनी राय व्यक्त करना अनिवार्य हो जाता है। कभी कभी हम जिस विषय के जानकार नही होते उस विषय के संबंध में भी हम अनधिकार तथा अनभ्यास टिप्पणी कर जाते है, ऐसी हरकतों से हर एक सच्चे अध्ययनकर्ता तथा संशोधक ने बचना चाहिए। आजके इस आधुनिकोत्तर, सत्योत्तर तथा व्यामिश्रतम डिजिटल युग में हर कोई हर/सभी विषयों का तज्ज्ञ नही हो सकता, अतः व्यक्त होते वक्त अपनी इस स्वाभाविक मर्यादा का ज्ञान जागृत रखना भी हर एक अध्ययनकर्ता तथा संशोधक के लिए अनिवार्य हो जाता है।
पोवार समाज की मूल उत्पत्ति के संदर्भ में प्रस्तावित वर्तमान/विद्यमान सिद्धांतों को मद्देनजर रखते हुए हमे नये सिरे से उपलब्ध कुछ संशोधन सामग्री का भी अध्ययन, परिशीलन करना, सत्य तथा तथ्य की खोज हेतू अनिवार्य रूप से अत्यावश्यक हो जाता है। इस दृष्टि से हमें डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर के दो महानतम ग्रंथ (1)Who were the Shudras, (2) Annihilation of Casts तथा आ.ह.साळूंखेजी का, दोनो महाकाव्य (रामायण, महाभारत) तथा अठारह पुराणों को खंगालकर लिखा गया, तथाकथित(?) ऋषि परशुराम विषयक मराठी ग्रंथ तथा उसीतरह काॅम्रेड शरद पाटील तथा दिलीप चव्हाण द्वारा संशोधित जातिविषयक ग्रंथों का सखोल अध्ययन तथा उनके निष्कर्षों का खंडन-मंडणात्मक संशोधन/परिशीलन अनिवार्य तथा परमावश्यक हो जाता है। किंतु इन ग्रंथों को लांघकर या नजरअंदाज कर यदि हम प्राचीनतम तथा ऐतिहासिक पोवार समाज की उत्पत्ति तथा उद्गम की खोज या इसका संशोधन करना चाहे तो वह संशोधन परिपूर्ण तथा विश्वमान्य होना दुष्कर जान पड़ता है। इन ग्रंथों के अध्ययन/परिशीलन से हमें धीरे धीरे प्रतीत होने लगता है कि, भले ही हम अपने आप को/पोवार समाज को क्षत्रिय कहलाए लेकिन कुछ भ्रामक वैदिक मान्यताएँ और तद्जनित भ्रामक वैदिक साहित्य के कुछ तथाकथित विचारकों की दृष्टि में हमारा वर्तमान पोवार समाज तथाकथित वर्णाश्रम की शूद्र, इस चतुर्थ श्रेणी में ही शायद माना जाता है, जो ऐतिहासिक तथा इतिहासपूर्व तथ्यों के मद्देनजर पूरी तरह से गलत तथा भ्रामक धारणाओं पर आधारित लगता है। इसका साधार/सप्रमाण खंडन होना आवश्यक हो जाता है। आज के युग में वर्णाश्रम की बात भले ही मायने नही रखती हो, कालसापेक्ष तथा विधीमान्य न हो, लेकिन संशोधन/परिशीलन करते वक्त हर एक सच्चे संशोधक को सभी उपलब्ध (धन+ऋण) पहलूओं तथा कटूतम तथ्यों(?)/कथनों पर भी निरपेक्ष तथा निष्पक्ष/तटस्थ भाव से साधार और सप्रमाण अभिव्यक्त होना क्रमप्राप्त होता है। इस दृष्टिकोण से हमारे पोवार समाज के उद्गम तथा उत्पत्ति का अद्यतन अध्ययन/संशोधन हो यह मेरे जैसे ज्ञानसागर में डुबकी लगाने हेतु तत्पर तथा इच्छुक व्यक्तियों की स्वाभाविक मंशा है।
मेरे उपरोक्त कथन/आकलन के लिए मै भगवान श्रीराम के एक सद्गुण 'रिपूणामपि वत्सल' का अनुसरण करते हुए अपनी अल्पांश बात यहाँ समाप्त करता हूँ। तथा पोवार समाज के उद्गम/उत्पत्ति विषयक तथ्यपरक खोज/संशोधन हेतू हमारे समाज के सभी गणमान्य अध्ययनकर्ताओं तथा संशोधकों को धन्यवाद दे कर उनका अभिनंदन भी करता हूँ। इस संदर्भ में प्रबुद्ध विचारक एवं संशोधक डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे इनका पूर्वप्रकाशित मूलभूत, महत्त्वपूर्ण लघुशोध प्रबंध "पवारी ज्ञानदीप" तथा समाज के कुछ युवा संशोधकों द्वारा हाल ही में प्रकाशित कुछ किताबें मील का पत्थर साबित हो सकती है। इन्हें मिसाल के रूप में आगे रखकर, इस विषय में अधिक संशोधन, परिशीलन तथा अध्ययन के लिए हमारे युवा/प्रौढ संशोधक/अध्ययनकर्ता आगे आए इसी शुभ कामना के साथ मेरा यह संक्षिप्त आकलन/कथन यहाँ समाप्त करता हूँ।
(*LGP/उजाखा = उदारीकरण/Liberalization, जागतिकीकरण/Globalization और खाजगीकरण/निजीकरण/Privatization)
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@ॲड.लखनसिंह कटरे,
[@Ex-सदस्य, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडल, मुंबई,
@राष्ट्रीय अध्यक्ष, पवारी(पोवारी) साहित्य-कला-संस्कृती मंडल, नागपूर,
@सदस्य, साहित्य अकादेमी, दिल्ली (संस्कृती मंत्रालय, भारत सरकार)
@विदर्भ प्रांत अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद/साहित्य भारती, दिल्ली.
@आजीवन सदस्य/संस्थापक, झाडीबोली साहित्य मंडल, साकोली, जि.भंडारा, महाराष्ट्र,
@आजीवन सदस्य/संस्थापक, मराठी बोली साहित्य संघ, महाराष्ट्र, नागपूर.]
बोरकन्हार-441902, ता.आमगांव,
जि.गोंदिया, (विदर्भ-महाराष्ट्र)
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