मै क्षमाप्रार्थी हूँ........!
*मै क्षमाप्रार्थी हूँ .........!*
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>> अध्यात्म, धर्म और विज्ञान की त्रयी से निर्मित त्रिभुज बहुत ही गूढ तथा अनिर्णित मानसिक संघर्ष से लिप्त एक आदिम संकल्पना है। हमें हमेशा भ्रम में भ्रमित रखना और धर्म को अध्यात्म तथा अध्यात्म को ही विज्ञान समझने की प्रक्रिया में उलझाएं रखना, यह इस आदिम संकल्पना का अनादि-अनंत खेल रहा है। इसीलिए जब हम धर्मग्रंथों का पठन, मनन, अध्ययन करने लगते हैं, तब हम स्वयं को धार्मिक नहीं आध्यात्मिक पथ के पथिक समझने/मानने लगते हैं। और विज्ञान को अध्यात्म का ही मुखर/अनुगामी अंग भी समझने/मानने लगते हैं।
>> भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ के जो चार आयाम(?) बताये जाते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष Absolute नहीं होते, बल्कि ये चारों मानव-जीवन के चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) के भी संपूरक तथा वाहक भी माने जाते हैं। समय, प्रकृति, अवकाश आदि कभी भी स्थिर नहीं होते बल्कि यह सभी हमेशा परिवर्तन-शील ही होते हैं। अतः उपरोक्त दोनों 'चतुष्ट्म्य'(!) का भी परिवर्तन-शील होना बिलकुल स्वाभाविक, प्राकृतिक तथा लाजिमी भी होता हैं।
>> इस संक्षिप्त प्रस्तावना के पश्चात मै सीधे अपने विषय पर आता हूँ। आज का मेरा विषय है, वानप्रस्थाश्रम/वनप्रस्थान का हमारी संस्कृति में महत्त्व तथा उसका प्रमुख उद्देश्य और आज की स्थिति में इसका अनुपालन! मनुष्य की उम्र 50 पार करने पर मनुष्य के लिए इस आश्रम की बात कही गई है। ब्रह्मचर्याश्रम में मनुष्य सांसारिक, व्यावहारिक आदि जीवनोपयोगी अनिवार्य ज्ञान प्राप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए पात्र होता है। और गृहस्थाश्रम में वह उस प्राप्त ज्ञान का सही-सही तथा विवेकपूर्ण उपयोजन कर अपनी सर्वव्यापी 'गरीबी' को और 'कम-गरीबी' की ओर ले जाने हेतु कार्यरत तथा प्रयासरत रहता है। और अपनी उम्र के पचास साल पार करने पर वनप्रस्थान के लिए प्रवृत्त होता है। जिस में/वानप्रस्थाश्रम में उसे अब अपनी इस सर्वव्यापी 'कम-गरीबी' को 'पूर्ण-गरीबी' की ओर ले जाने हेतु कार्यरत तथा प्रयासरत होना होता है। जिसे हम सरल शब्दों में अपरिग्रह तथा अल्प-स्थितप्रज्ञता भी कह सकते हैं।
>> यह सब सैद्धांतिक रूप से बिलकुल सही भी हो सकता है। लेकिन जैसे कि हम पूर्व में देख चुके हैं कि समय, प्रकृति, अवकाश सदैव परिवर्तन-शील होने से हम इस विषय में "आज" भी 'लकीर के फकीर' ही बनकर नहीं रह सकते। क्योंकि आज हम देखते/जानते हैं कि उम्र के पचास के बाद भी मनुष्य पूरी तरह (शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, आदि अवस्था और व्यवस्था में) सक्षम तथा सक्रिय भी रहता है, जो वाजिब और लाजिमी भी हैं। अतः ऐसे सक्षम और सक्रिय व्यक्ति की कृतिशीलता को हम बेकार नहीं जाने दे सकते। यह तो उन व्यक्तियों की कृतिशीलता का ही नहीं बल्कि संपूर्ण समाज और देश/राष्ट्र की स्वाभाविक शक्ति का प्रचंड विनाश (-हास) ही कहा जा सकता है। अतः आज के इस भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के दौर में हमें इस वानप्रस्थाश्रम/वनप्रस्थान की नयी परिभाषा गढ़कर उसपर अंमल करना/उसका अनुपालन करना, मुझे आवश्यक लगता है तथा यह वर्तमान समय की मांग भी लगती है।
>> वानप्रस्थाश्रम/वनप्रस्थान की अवस्था में, भारतीय संस्कृति द्वारा, मनुष्य की जो उच्चतम मानसिक अवस्था परिभाषित की गयी है, उसका अनुपालन हमें वनप्रस्थान न करते हुए, तथा इसी समाज/देश/राष्ट्र में अलिप्त भाव से कार्यरत रहकर करना क्रमप्राप्त होगा। इसी सोच को मद्देनजर रखते हुए मैंने मेरे निवृत्ति के बाद स्वयं को अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार कार्यरत रहने का संकल्प किया है और अपनी अल्पस्वल्प शक्तिनुसार मै कार्यरत भी हूँ। इससे मै किसी पर कोई उपकार या एहसान नहीं कर रहा हूँ, बल्कि भारतीय संस्कृति द्वारा परिभाषित वानप्रस्थाश्रम का आज की व्यामिश्रतम तथा परिवर्तित स्थिति में अनुपालन करने का प्रयास कर अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहने की प्रवृत्ति को संभाल मात्र रहा हूँ।
>> इसीलिए मैं द्वेषबुद्धि, विषवेली, ... आदि नकारात्मक सोच/चों से यथासंभव निवृत्त होकर मेरे लिए प्रयुक्त तर्कदुष्टता, मत्सरभाव, अवमानना, मानखंडना, अतिरेक, अपवृत्ति, द्वेषभाव ... आदि से संपृक्त कठोर से कठोरतम छद्म भाषाप्रयोगों और प्रयोगकर्ताओं को भी क्षमा करते रहने का भरसक प्रयास करते रहता हूँ। इसी तरह मै भारतीय संस्कृति द्वारा परिभाषित वानप्रस्थाश्रम/वनप्रस्थान की प्रक्रिया को, आज की परिभाषा में, अपने जीवन में बसाने का प्रयास भी करते रहता हूँ। मेरे इस तथाकथित(?) वानप्रस्थाश्रम/वनप्रस्थान की अर्वाचीन प्रक्रिया के बारे में किसी महानुभाव/वों को कोई शक हो, या उन महानुभाव/वों को 'अधजल गगरी छलकत जाय' वाली कहावत को मेरे द्वारा चरितार्थ करना ही लगता हो, तो मैं ईसा मसीह के शब्दों में सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि, "प्रभो, इन्हें माफ करो, ये नहीं जानते कि ये क्या कर/कह रहे हैं।"
>> मेरे इस आत्मावलोकन में यदि किसी महानुभाव/वों को 'अव्यापारेषु व्यापार' या 'छोटा मुँह - बड़ी बात' नजर आये तो मैं उसके लिए उन सबका क्षमाप्रार्थी हूँ।
>> क्षमस्व, क्षमस्व, क्षमस्व! (#745)
>> 🙏🙏🙏
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@ॲड.लखनपालसिंह कटरे "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया (विदर्भ-महाराष्ट्र)
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