एक न-गझल और...!

*एक न-गझल और...!*
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मै अजनबी बन चल रहा था अपने पथ पर 
पता नहीं कैसे आ बैठी, तुम मेरे मन-रथ पर || 
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मन-रथ मेरा डगमगाया, लगी छूटने लगाम 
कंकड़-पत्थर उछलने लगे, फिर मेरे पथ पर ||
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घोड़े मेरे मन-रथ के पथ छोड़ चले अरण्य में 
अरण्यवती तुम ही हो, मै संभला यह जानकर || 
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संभल कर भी मै, फसता गया अरण्यजाल में 
लगाम थाम ली फिर, तुमने अरण्यवती होकर ||
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गहराने लगा अस्तित्व तुम्हारा मन-रथ में मेरे
अकस्मात धावा बोल दिया तुमने मेरे दिलपर ||
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घुलने लगा शनैः शनैः मेरा अस्तित्व अरण्य में 
हुआ मशहूर मै अकस्मात, तुम्हारी जुबानपर ||
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नज़र लग गई फिर चक्रवात हुआ कार्यान्वित 
अदृश्य कांटे बिछने लगे, मेरे अपनेही पथ पर ||
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द्विभाजक फिर होने लगा असरदार धीरे धीरे 
मै भी सरकने लगा, अपनेही एकल पथ पर ||
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इसी कश्माकश में अरण्य में उभरा दावानल 
और हुआ उषोदय फिर, मेरे मन-क्षितिज पर ||
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@लखनपाल सिंह "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया.
(10.12.2023)
~~~~~~~~~~~~~१ॐ~~~~~~~~~~~~






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