असहमति और संवाद की परंपरा : एक आकलन (उद्घृत)
*असहमति और संवाद की परंपरा : एक आकलन*
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कहा जाता है कि सत्य हर जगह से थक-हारकर अंततः साहित्य में आश्रय लेता है। क्योंकि सत्य को असहमति के कई टोंकदार काटों एवं कंकरों से गुजरकर ही अपना अस्तित्व बनाना होता है। इसीलिए असहमति की शुरुआत मानवता की यात्रा के साथ हुई यह माना जाता है। मानवता की यात्रा और सत्य का उद्भव परस्परावलंबी होने का अनैतिहासिक इतिहास सभ्यताओं के इतिहास के साथ-साथ परिलक्षित होता है। असंतोष, असहमति और प्रतिवाद के कठीण परीक्षणोंसे गुजर कर ही सत्य की खोज संपन्न होती है। इसीलिए धर्म, सभ्यताएं, दुनिया की महान साहित्य कृतियां यह सब असहमति की देन मानी जाती है। वेद-वेदांत के रचनाकार, बुद्ध, रामानुज, गोरखनाथ, रामानंद, वल्लभ, कबीर, गांधी, प्रेमचंद जैसे व्यक्ति असहमति की भूमि पर खड़े होकर ही कुछ मूल्यवान दे सके थे। इतना ही नहीं, भारत का संविधान भी सामंती-औपनिवेशिक धारणाओं से असहमति की बुनियाद पर निर्मित हुआ और इसके भीतर से लोगों ने ('हम भारत के लोगों' ने) नए भारत का स्वप्न देखा। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि, मानव-समाज में असहमति का होना और उसे पनपने का अवसर मिलना सत्य को प्रतिष्ठापित करने एवं सत्य को परिभाषित करने हेतु परमावश्यक तथा अवश्यंभावी होता है। एक प्राचीन कहावत भी है, 'वादे वादे जायते तत्त्वबोधः' अर्थात विचारों की टकराहट तथा असहमति के उद्भव से ही सत्य का बोध होता है।
किन्तु इस आधुनिक युग में असहमति को 'दुष्मन का विचार' जान/मानकर 'असहमति से सत्य के प्रकट होने का मार्ग' ही अवरुद्ध किया जा रहा है। इसी खतरे को भांपकर संयुक्त राष्ट्र ने 2001 के वर्ष को 'सभ्यताओं के संवाद' का वर्ष घोषित किया था। संवाद हमेशाही सभ्यता का चिन्ह रहा है, लेकिन संवाद तभी संभव है जब बोलने वालों के पास सुनने की भी क्षमता हो। कहना न होगा कि संवाद ही मानव-समाज को सदैव जीवंत और गतिशील बनाकर रखते हैं। लेकिन फिलहाल हम देखते, सुनते, अनुभव लेते है कि, गैर-जरूरी आरोप-प्रत्यारोप के बीच संवाद की जगह सिकुड़ गई है, बल्कि असहमत व्यक्ति को शत्रु के रूप में देखा जाने लगा है। जबकि हमारा पौराणिक/प्राचीन इतिहास बताता है कि विभीषण राम का भक्त था और रावण से असहमत था, लेकिन रावण की लंका में एलानिया रहता था। विदुर कौरवों के साथ रहते हुए भी उनके गलत विचारों से खुलकर असहमत होते थे और फिरभी उनका आदर था। धृतराष्ट्र का एक बेटा युयुत्सु अपने भाइयों से अलग मत रखते हुए भी पांडव पक्ष से लड़ा था। यह प्राचीन महाकाव्यों की बात हुई।
लोक भाषाओं को चुनने वाले भक्त कवि भी अपने समय की धार्मिक व्यवस्था से कई मुद्दों पर असहमत थे। वे बाह्याडंबर और भेदभाव के विरोधी थे। वे खुलकर बोले और सुने गए। 19वीं सदी के नवजागरणकालीन व्यक्तित्व सामाजिक कुप्रथाओं के अलावा अपनी सीमा में उपनिवेशवाद से भी लड़े। वे खुलकर बहस करते थे, तर्क करते थे।
जिस देश में असहमति की ऐसी दीर्घ परंपरा है, वहां समाजव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, ज्ञानव्यवस्था, तर्कव्यवस्था में असहमति के प्रति आदर और संवाद का अभाव चिंताजनक ही माना जाना चाहिए।
भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' के केंद्र में रस है, आनंद है। इसमें एक रोचक मामला है कि ग्रंथ के आखिरी हिस्से में ऋषि-मुनि कलाकारों को इसलिए शाप देते हैं कि उन्होंने नाटक खेलकर उनके पाखंडों को उजागर किया है, उनपर व्यंग्य किया है। अतः जाओ, तुम्हें सवर्ण समाज से बाहर किया जाता है! इसलिए नाट्यशास्त्र पंचम वेद है, शूद्रों का वेद है। कलाकार, लेखक, तत्त्वज्ञ, विचारवंत की श्रेष्ठता इसी में है कि वह हजम नहीं किया जा सके, भले बहिष्कृत हो जाए, जैसा प्राचीन युग में नाट्यकर्मियों के साथ घटित हुआ।
अतः असहमति से घबराकर भाग जाना या उसपर निषिद्ध वार करना दोनों भारतीय संस्कृती तथा इतिहास के परिप्रेक्ष्य में वाजिब नहीं माना गया है। असहमति से ही अंततः सत्य का उद्भव होना तय होता है।
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(हिंदी की मासिक पत्रिका 'वागर्थ' के मान्यवर संपादक श्रीशंभुनाथ जी के मार्च 2023 के संपादकीय से साभार)
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संग्राहक :-
@ॲड.लखनसिंह कटरे,
बोरकन्हार, जि.गोंदिया (विदर्भ-महाराष्ट्र)
(16/03/2023)
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