कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) और... (प्रकाशित)

*कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) और...* (प्रकाशित)
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(दिवान मेरा : हिंदी द्वैमासिक : फर-मार्च 2024)
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@ॲड.लखनपाल सिंह कटरे "अपराधी"
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>> मानव की आकलन क्षमता का पूरा पूरा ज्ञान अभी भी विज्ञान खोज ही रहा है। मानव मस्तिष्क अभी भी वैज्ञानिकों के लिए एक अनबुझ पहेली ही साबित हो रहा है। इस मानवी आकलन क्षमता और मानवी बौद्धिकता/प्रतिभा के विभिन्न पहलुओं पर संबंधित वैज्ञानिकों द्वारा प्रकट/प्रस्तुत भिन्न भिन्न अनुभव तथा आकलन हम आये दिन पढ़ते रहते है। अभीतक मानवी बौद्धिकता/प्रतिभा के जो विभिन्न आयाम वैज्ञानिकों ने खोज लिए है, उनका एक सर्वसाधारण ब्योरा अमेरिकन मनोवैज्ञानिक हावर्ड गार्डनर द्वारा प्रस्तुत किया गया है। जिसके अनुसार मानवी बौद्धिकता/प्रतिभा के आठ प्रकार माने गए है। वे है ---
1) दृश्य स्थानिक या आकाशीय बौद्धिकता/प्रतिभा
(Visuals - Spatial)-  जो लोग Visuals - Spatial में मजबूत होते हैं, वे चीजों को देखने में बाकि लोगों से अच्छे होते है। यह व्यक्ति अक्सर दिशाओं के साथ-साथ नक्शे, चार्ट, वीडियो और चित्रों को देखने में अच्छे होते हैं। 
2) शाब्दिक भाषायी या संबंधी बौद्धिकता/प्रतिभा (Verbal - linguistic)- जो लोग Verbal - linguistic में मजबूत होते हैं, वह लिखते और बोलते समय शब्दों का अच्छी तरह से उपयोग करने में सक्षम रहते है। यह लोग कहानियाँ लिखने में अच्छे होते है। 
3) तार्किक गणित संबंधी बौद्धिकता/प्रतिभा (Logical - Mathematical)- जो लोग Logical - Mathematical बुद्धि में मजबूत होते हैं, वे तर्क करने, पैटर्न को पहचानने और तार्किक रूप से समस्याओं का विश्लेषण करने में अच्छे होते हैं। 
4) शारीरिक क्रियात्मक बौद्धिकता/प्रतिभा ( Bodily - Kinesthetic)- उच्च Bodily - Kinesthetic बुद्धि वाले लोगों को शरीर की गति, क्रिया करने और शारीरिक नियंत्रण में अच्छा कहा जाता है। 
5) संगीतात्मक बौद्धिकता/प्रतिभा ( Musical - Rhythmic)- जिन लोगों के पास मजबूत Musical - Rhythmic बुद्धि होती है, वे पैटर्न, लय और ध्वनियों को सोचने/समझने में अच्छे होते हैं। 
6) अंतर्विषयक या पारस्परिक बौद्धिकता/प्रतिभा (Interpersonal)- जिन लोगों के पास मजबूत Interpersonal बुद्धि होती है, वे दूसरे लोगों के साथ समझने और बातचीत करने में अच्छे होते हैं। 
7)अंतःव्यक्तित्व बौद्धिकता/प्रतिभा (Intrapersonal)- जो व्यक्ति इंट्रापर्सनल इंटेलिजेंस में मजबूत होते हैं, वे अपनी भावनात्मक स्थिति, भावनाओं और प्रेरणाओं से अवगत होने में अच्छे होते हैं।
8) प्राकृतिक बौद्धिकता/प्रतिभा (Naturalistic)- प्रकृतिवादी गार्डनर के सिद्धांत का सबसे हालिया जोड़ है। यह पर्यावरण के तत्वों को अलग करने, वर्गीकृत करने और पर्यावरण से संबंधित कार्य करने की क्षमता है। इस प्रतिभा/क्षमता के धारक पर्यावरण पर अवलोकन और प्रतिबिंब के कौशल को सहजता से प्राप्त कर लेते है, तथा यह गुण इस क्षेत्र के काम में लगे लोगों, वनस्पति विज्ञानियों, पशु चिकित्सकों, पारिस्थितिकीविदों, सामान्य रूप से जानवरों और पौधों के साथ संपर्क का आनंद लेने वाले लोगों में भी देखा जा सकता है।
>> मानवी बौद्धिकता/प्रतिभा के इन आठों प्रकारों में जिसका समावेश नहीं हो पाया है ऐसा, छुपा-रुस्तमसा, बौद्धिकता(प्रतिभा(?)) का एक प्रकार और भी है। जिससे हम सभी भलीभाँति परिचित है। वह प्रकार है, *कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा)* का प्रकार। यह कुत्सित बौद्धिकता(प्रतिभा) मानवी बौद्धिकता के उपरनिर्दिष्ट आठों प्रकारों से भी शक्तिशाली(?) होती है, इसकी मारक शक्ति अमर्याद होती है। छद्म तथा प्रच्छन्न ज्ञान का यह भंडार होता है, यह कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) का प्रकार हमेशा काल्पनिक/आभासमय तथा अनाकलनीय भ्रम और भय फैलाकर कुतर्क द्वारा समाज में विद्वेष, परमतवितुष्टता और अविश्वास का माहौल तयार करने में माहिर होता है। मानव जाति के स्वभाव में आदिम हिंसा के शिकारीभाव के कुछ अंश अभी भी विद्यमान होने से मानवी बुद्धि अनायासही प्रेम, सत्य, अहिंसा, सहानुभूति, समानुभूति, सहअस्तित्वभाव, सामंजस्यभाव आदि सद्गुणों (अच्छाई) से बलात(?) प्रभावित होने की बजाय; द्वेष, मत्सर, क्रूरतम अलगाववाद, हिंसा, परनिंदा आदि दुर्गुणों (बुराई) से बहुत जल्द और सहजता से प्रभावित होती पाई/देखी जाती है। परिणामस्वरूप समाज में अल्पसंख्य होने के बावजूद यह कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) के धारक और वाहक व्यक्ति अपने कुतर्कों के बल पर समाज में अल्प काल में ही मान्यता प्राप्त कर शक्तिशाली(?) भी होने/लगने लगते है और उनके अल्पसंख्य अनुयायी भी बहुसंख्य समाज जनों पर बरबस हावी होने लगते हैं। सद्गुणी प्रतिस्पर्धीयों के अहित में अपने कु-आनंद का मूल रोपना/देखना/खोजना यह इन कुत्सित बौद्धिकता(प्रतिभा) धारकों का स्वभावही हो जाता है।
>> आजके इस एलपीजी*प्रणित सत्योत्तरकालीन संगणकीय तथा समाजमाध्यमीय युग में कुतर्कों द्वारा भ्रम, भय और अविश्वास का प्रसार करना भी बहुत सरल हो जाने से कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) के समाजदुष्ट ऋणात्मक लक्षणों में वृद्धि भी देखने में आती है। मराठी के एक आध्यात्मिक-कम-व्यावहारिक संत स्वामी रामदास अपने सुप्रसिद्ध काव्यग्रंथ "दासबोध" (दशक 19, समास 7, श्लोक 17) में लिखते है कि, "अभ्यासें प्रगट व्हावें। नाहीं तर झाकोन असावें। प्रगट होऊन नासावें। हे बरें नव्हे।।", जिसका अर्थ यह होता है कि, कुछ भी बोलने या लिखने से पूर्व उस विषय का पूर्ण रूपेन अध्ययन करना अनिवार्य रूप से परमावश्यक होता है, अन्यथा अज्ञानता प्रगट होकर किरकिरी होती है...। लेकिन आजके उपरनिर्दिष्ट युग में व्हाॅट्सॲप, फेसबुक, ट्विटर आदि समाजमाध्यमों में व्यक्त होने हेतू किसी अध्ययन की आवश्यकता नहीं होती। उल्टे अध्ययन की ऐशीतैशी कर, सुनी-सुनाई बातों को आधार बनाकर, तथ्य को तोड़-मरोड़कर, कुतर्कों द्वारा भ्रम को सत्य का नकली जामा पहनाकर अपनी मनमाफिक और मनमानी बात को प्रवाहित और प्रसारित करना ही इस कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) का मानो जैसे कोई पंथ ही हो गया है। >> कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) की सही-सही पहचान कर ऐसी कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) के धारकों तथा वाहकों के कुतर्कों और अन्य समाजदुष्ट कार्यकलापों की पोलखोल करना बिलकुल आसान नहीं होता। क्योंकि इन/ऐसे कुत्सित लोगों में एक अजीबोगरीब चुंबकीय तथा मोहक शक्ति होती है, जिसकी वजह से उपरनिर्दिष्ट आठों धनात्मक बौद्धिकता(प्रतिभा) धारकों के लिए उनके अपने सौजन्यवश तथा प्रोटोकॉल/शिष्टाचारवश उन कुत्सित(विकृत) मनोवृत्ती धारकों और वाहकों का और उनके कुतर्कों का खुलकर विरोध करना बहुतही कठीण हो जाता है। ऐसा क्योंकर होता है, इसका ईष्ट तथा तार्किक समाधान/उत्तर मिलना भी आज के इस दोलायमान और दोगले युग में दुष्कर सा हो जाता है, क्यों कि 'जय बोलो बेईमान की' यह मंत्र फिलहाल आम हो गया है। शायद इसीलिए धनात्मक बौद्धिकता(प्रतिभा) धारक सज्जन ऐसे/इन कुत्सित(विकृत) जनों को बरबस ही नजरअंदाज करते रहते है/करने लगते है। परिणामस्वरूप इन कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) धारकों एवं वाहकों की समाज-विघातक घुड़दौड को रोकना सामान्य समाज जनों के लिए तो और भी असंभव सा हो जाता है। 
>> इसीलिए इन कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) धारकों और वाहकों का असली चेहरा पहचान कर उनके समाजदुष्ट षडयंत्रों का पर्दाफाश करने हेतू समाज के सभी, सामान्य तथा सुधी, जनों को प्रबोधनात्मक संवाद और आत्मिक सहवास द्वारा जागृत करना अनिवार्य रूप से परमावश्यक हो जाता है। यह कार्य बहुतही कठीण तथा दुष्कर भी है, किन्तु सुधी, सज्जन तथा विवेकशील और नैष्ठिक समाजजन किंकर्तव्यमूढ होकर बैठ जाए ऐसा भी नहीं हो सकता। अतः सभी धनात्मक बौद्धिकता(प्रतिभा) धारक समाजजनों के लिए यह परमावश्यक हो जाता है कि वे अपना बौद्धिक आलस्य त्याग कर इस कुत्सित(विकृत) बौद्धिकता(प्रतिभा) को नामोहरम करने की मुहिम को अंजाम देने हेतू कमर कस के आगे आए तथा समाज के भविष्य को उज्ज्वल, पवित्र और सर्व-हितकर बनाने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका को अंजाम दे। 
इति शम। (शब्दसंख्या < 850)
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(*एलपीजी = Liberalization, Privatization & Globalization)
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@ॲड.लखनपाल सिंह कटरे "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया (विदर्भ-महाराष्ट्र), भारत.
(गणेश चतुर्थी/31.08.2022)
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