पोवारी बोली अना साहित्य निर्मिती : एक संक्षिप्त आकलन
*पोवारी बोली अना साहित्य निर्मिती : एक संक्षिप्त आकलन* --- @ॲड.लखनसिंह कटरे.
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>> तसो तं मी साल 2002 मा आमरो गाव मा नववो झाडीबोली साहित्य संमेलन लेयेव् होतो, तबपासनाच मी झाडीबोली को संगसंगच् पोवारी बोली को पुनरूत्थान साती भी गंभीरतापूर्वक-पर-हलकोफुलको काम कर रही सेव्. भारत सरकार को ANTHROPOLOGICAL Deptt. द्वारा 1990 को आसपास ANTHROPOLOGICAL SURVEY OF INDIA करनो मा आयेव् होतो. वोको महाराष्ट्र राज्य को पुरो अहवाल PEOPLE OF INDIA : MAHARASHTRA PART 1, 2, 3 असो नावलका POPULAR PRAKASHAN PVT. LTD. MUMBAI द्वारा सन 2004 मा इंग्लिश मा प्रकाशित भयी से. वू पूरो अहवाल (तीनही पार्ट) मी 29.08.2005 ला खरेदी करी सेव् अना बाची सेव्. तीनही पार्ट मा, महाराष्ट्र मा, पोवार समाज अना पोवारी बोली को अस्तित्वच शून्यवत दर्शायेव् गयी से. वोकोसाती भी मी सितम्बर 2005 पासना संबंधितईन संगं पत्रव्यवहार कर रही सेव्. अना आपलो अल्पबुद्धि-आकलन को अनुसार, पोवारी बोली को पुनरूत्थान, संवर्धन, समर्थन, यथार्थ अंकन साती बोली मा कविता, कथा, लेख आदि लिखन/लिखावन को हलको फुलको काम भी कर रही सेव्. (मंज्या मी काही मोठो तीर मारी सेव् असो नोहोय्. मी मोरो अल्पबुद्धि-आकलन को अनुसार आपलो पोवार होन को कर्तव्यच कर रही सेव्, येकी मोला नम्र जाणीव से.)
>> सितम्बर 2010 मा मी फेसबुक परा आपलो पेज उघडेव होतो. तबं पासना मी फेसबुक पर अल्पस्वल्प रूप मा सक्रीय सेव्. असोच् मोरो फेसबुक पेज पर लिखता लिखता लगभग साल 2012-13 मा मी एक लहानसो टिपण-लेख की एक पोस्ट पोवारी बोली मा फेसबुक पर टाकेव् तं मोरो फेसबुक मित्रईननं वोला बड़ो नवाजीन, बोहुत पसंद करीन. वोकोलका मोरी हिंमत बढ़ी. मी आपलो असोच हलको फुलको प्रयास करतच रहेव्. पर वोला सामुदायिक रूप देनो, मी आपलो नौकरी को व्यस्तता को चक्कर मा नही कर सकेव होतो. मोला मोरो नाव होये पाह्यजे अशी कोणतीच इच्छा नोहोती, काहे का मोरो पह्यले भी कई पोवार महानुभावईन्न पोवारी बोली मा छिटपुट विविध साहित्य लेखन करी होतीन. मुनस्यारीच मी खुदला पोवारी बोली को पुनरूत्थान करनेवालो कभीच नही मानेव अना कभी तसो मी मान भी नही सकू. मोरोदून पह्यलेच पोवारी बोली मा साहित्य लिखने वाला कैक पोवार महानुभाव भया सेती येकी मोला थोडीबहुत जानकारी होती अना से. मुनस्यारीच मी एकला चलो रे वानी पोवारी बोली साहित्य को हलको फुलको काम करत होतो. फरवरी 2013 मा निवृत्त भयेव् तबं मंग मी मोरो येनं काम मा थोडोसो दम लगावन लगेव्. पर मोरो येव् काम तबं भी हलको फुलकोच होतो. मी काही आद्य कामकर्ता नोहोव् येकी मोला तबं भी जाण होती अना आबं भी से. मोरो पोवारी बोली साहित्य को संबंध मा को अल्पस्वल्प काम आमरो पूर्वजईनको काम को सामने बिलकुल नगण्य से येकी मोला जाण से. उन पूर्जईनला मोरो नमन से.
>> असोमाच जगप्रसिद्ध भाषाविद अना विचारवंत डाॅ.गणेश देवी को मुख्य संपादकत्व मा प्रकाशित 'भारतीय भाषांचे लोकसर्वेक्षण : महाराष्ट्र' येन् (जगभर प्रसारित) ग्रंथ मा पोवार समाज अना पोवारी बोली को बारा मा भ्रामक, अपुरी, अनैतिहासिक, अतिरंजित, सम्भवतः बदनामीकारक माहिती प्रकाशित भयी से, येकी मोला जानकारी मिली. वोकोसाती भी मी जनवरी 2018 पासना डाॅ.गणेश देवी ला लेखी शिकायत करस्यानी उनला मानहानी को नोटीस देयी सेव्. तबं उननं गलती स्वीकार करस्यानी अगलो आवृत्ती मा गलती की दुरुस्ती करन की मोला लेखी हमी देयी सेन्.
>> वोको बादमा येनं कडी को रूपमाच् मी डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे इनला एप्रिल-मई 2018 मा उनको घरं नागपूर मा भेटेव् अना मोरो हलकोफुलको काम की जानकारी देयस्यान् पोवारी बोली अना पोवारी संस्कृती को खरोखुरो उत्थान साती पोवारी बोली मा विविधांगी साहित्य लिखेव् बगैर गत नाहाय या बात सांगेव्. डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे भी असोच बिचार करत होता. वोको परिणामस्वरूप अक्तूबर/नवंबर 2018 मा पोवारी बोली को इतिहास मा पह्यलोच् बेरा पवारी (पोवारी/पंवारी) बोली साहित्य, कला, संस्कृती मंडल की रूपरेखा कायम करनो मा आयी. अना लवकरच पोवारी बोली साहित्य को इतिहास मा पह्यलोच् बेरा असो बोली साहित्य, कला, संस्कृती मंडल को अधिकृत रजिस्ट्रेशन करनो मा आयेव्. येन् ऐतिहासिक राष्ट्रीय मंडल का पदाधिकारी, अध्यक्ष डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे, उपाध्यक्ष ॲड.लखनसिंह कटरे अना सचिव ॲड.देवेंद्र चौधरी, असा नियुक्त करनो मा आया सेती. अना येन् मंडलद्वारा अजवरी तीन (फरवरी 2019, दिसंबर 2021, दिसंबर 2022) अखिल भारतीय पोवारी बोली साहित्य संमेलन भी यशस्वी रूपमा पार भया सेती. (मी दुसरो संमेलन को संमेलनाध्यक्ष भी होतो अना तिसरो संमेलन का संमेलनाध्यक्ष ॲड.देवेन्द्र चौधरी होता.)
>> येन् मंडल को उपलक्ष मा सचिव ॲड.देवेंद्र चौधरी इननं मंडल को सभी पदाधिकारीको संमतीलका नवंबर-दिसम्बर 2018 मा व्हाॅट्सॲप समूह की स्थापना करस्यानी साप्ताहिक कविता स्पर्धा को आयोजन आरंभ करीन. (अक्तूबर 2022 वरी येन् कविता स्पर्धान् सलग 220 स्पर्धा को ऐतिहासिक आकडा पार करस्यानी पोवारी बोली साहित्य मा एक यशस्वी झेंडा गाळ देई सेस्!) येन् सोशल मिडीया को कविता स्पर्धा मा पोवारी बोली की कविताईनकी बरसातच होन् लगी. अजवरी मुख्यतः मौखिक रुपमाच स्थित पोवारी बोली आता लिखित रूपमा जोरसोरलका अवतरित होन् लगी. पुरो पोवार समाज मा पोवारी बोली को पुनरूत्थान की लहरच पैदा भयी. पोवारी बोली साहित्य को विविध विधा की लगभग 45-50 पुस्तकं प्रकाशित भयी सेती. (ॲड.देवेंद्र चौधरी अना ॲड.लखनसिंह कटरे इनकी पोवारी बोली साहित्य की दुय किताबं (ई-बुक) गुगल/ॲमेझाॅन परा विनामुल्य उपलब्ध सेती.) एतरोच् नही तं 2018, 1019, 2020 को अनुक्रमे बडोदा (गुजरात), यवतमाळ अना उस्मानाबाद (महाराष्ट्) मा आयोजित विश्वप्रसिद्ध अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन को कविता कट्टा कविसंमेलनमा मंडल का सचिव ॲड.देवेंद्र चौधरी इननं पोवारी बोली मा काव्यपाठ करस्यानी एक इतिहासच रचीन्. धीरूधीरू पुरो पोवार समाज मा पोवारी बोली मा साहित्य लेखन की उत्कंठा जागृत भयी. बहुतसो पोवार महानुभावईन्न पोवारी बोली को उत्थान अना संवर्धन साती भिन्नभिन्न व्हाॅट्सॲप समूह स्थापित करीन, काहीनं वैयक्तिक रूपमा काम सुरू करीन्, भिन्नभिन्न सोशल मिडीयामा पोवारी बोली साहित्य को डंका बजन् लगेव. पुरो पोवार समाज आपलो मातृभाषा को/पोवारी बोली को महत्त्व प्रतिपादित करन् लगेव्, लिखाण, संशोधन, विवेचन करन् लगेव्.
>> अना मंग असो मा च काही स्वनामधन्य तथाकथित स्वयंघोषित छद्मी व्यक्ति आपलो प्रच्छन्न स्वभाव को प्रदर्शन करन लग्या अना 'पोवारी बोली को पुनरूत्थान मीच करेव; मीच पोवारी बोली को आद्य-प्रवर्तक आव्' अशी शेखी भी बघारन् लग्या. काही हरकत नाहाय्, आखिर पोवारी बोली को पुनरूत्थान होयस्यारी येन् बोली मा साहित्य निर्मिती होय् रही से, येन् महत्त्वपूर्ण प्रकाश को उजाळो मा असा छद्मी काजवा भी काम का च् माने पाह्यजे असो मोरो नम्र बिचार से.
जय पोवार!
जय पोवारी बोली!
जय पोवारी बोली साहित्य!
जय पोवारी संस्कृती!
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@ॲड.लखनसिंह कटरे,
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया.
(05.01.2023)
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