¤साहित्य का देश-काल¤ (हिंदी//संकलन/उद्घृत)

*साहित्य का देश-काल*  (हिंदी - संकलन/उद्घृत)
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(>> मेरे भी साहित्य-लेखन तथा साहित्य-अध्ययन के कुछ पहलू (बिंदु) निम्नानुसार ही है।)
@ॲड.लखनसिंह कटरे 
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>> वस्तुतः देश-काल की अवधारणा मूलतः साहित्य की नहीं है। वह दर्शन, विज्ञान और इतिहास (समाजशास्त्र) से सम्बद्ध है। दिलचस्प बात यह है कि दर्शन, विज्ञान और समाजशास्त्र में देश-काल की धारणा एक जैसी नहीं है। उनमें काफी भिन्नताएँ हैं। साहित्य के देश-काल पर बात करने का अर्थ है ज्ञान के इन अनुशासनों के आलोक में साहित्य को देखना। स्वभावतः यह अंतर्ज्ञानानुशासनात्मक (Interdisciplinary) विषय है। उसके विस्तार, उसके आयाम, उसकी जटिलता का संबंध इसी बात से है कि वह दर्शन-विज्ञान-इतिहास जैसी बिलकुल भिन्न और स्वतंत्र ज्ञान शाखाओं के संदर्भ में साहित्य पर विचार करने की अनिवार्यता उत्पन्न करता है। 

>> जिसे हम देश-काल कहते हैं, वह हमारे दृष्टिकोण (Stand-point) का निर्धारण करता है। हम चाहकर भी इस दृष्टिकोण से निरपेक्ष नहीं हो सकते, भले उसके प्रति सजग हों या न हों। कालिदास बहुत महान कवि हैं। लेकिन आज कोई कालिदास की तरह लिखकर महान तो क्या, महत्त्वपूर्ण भी नहीं हो सकता। न वैसी परिस्थितियाँ रही, न अभिरुचि और संस्कार। यह बदलाव किसी भी प्रतिभाशाली व्यक्ति की इच्छा से नहीं होता। इस बदलाव के साथ साहित्य का स्वरूप परिवर्तित होता है। कालिदास से प्रेरणा लेकर निराला या नागार्जुन महान साहित्य लिख सकते हैं, उनकी आवृत्ति करके नहीं। निरंतरता के इस परिवर्तनशील संबंध को समझना देश-काल के माध्यम से ही संभव है। इसी प्रकार, होमर या शेक्सपीयर की महानता में भी संदेह नहीं है। लेकिन भारत में होमर या शेक्सपीयर नहीं हो सकते थे, जैसे यूरोप में वाल्मीकि या कालिदास नहीं हो सकते थे। यदि कालिदास से हमारे समय का अंतर कालगत भिन्नता का सूचक है तो होमर से निराला का अंतर देशगत भिन्नता का। इन प्रश्नों पर विचार करना देश-काल की धारणा से ही संभव है। इसके बिना न हम अब तक के अपने विकास और वैशिष्ट्य को समझ सकते हैं, न भविष्य की दिशा का निर्णय कर सकते हैं। 

>> दूसरी बात यह है कि दर्शन, विज्ञान और समाजशास्त्र एक-दुसरे से अलग-अलग विद्याएँ हैं। लेकिन साहित्य में दर्शन, विज्ञान, समाजशास्त्र या इतिहास और राजनीति सभी समाहित हैं। ज्ञान के दूसरे अनुशासनों में जीवन के अंश होते हैं, साहित्य ही अभिव्यक्ति का वह रूप है जिसमें पूरा जीवन समाहित होता है। यूनानी विचारक प्लेटो बहुत चिंतित होते थे कि कवि या त्रासदीकार शिल्पी नहीं है फिर भी शिल्प पर बोलता है, वह वैद्य नहीं है फिर भी चिकित्सा पर बोलता है, राजनीतिज्ञ न होकर भी शासन के बारे में राय देता है! साहित्य की यह जो व्याप्ति है, वह इनमें से अन्य किसी अनुशासन में नहीं है। लेकिन साहित्य में सभी अनुशासनों की व्याप्ति है। इसलिए साहित्य को यह अधिकार है कि वह देश-काल के माध्यम से इन सभी अनुशासनों पर विचार करे या इन अनुशासनों के संदर्भ में देश-काल के बारे में विचार करे। यह विभिन्न अनुशासनों के साथ एक प्रकार का संवाद है जिसमें साहित्य की अपनी विशिष्ट स्थिति है।

>> एक बात और साहित्य में जो चित्रण होता है, वह चाहे पुराने समय का साहित्य हो, मध्यकालीन साहित्य हो या आज का साहित्य हो, वह दो आधारों पर होता है। एक आधार है भाव। उस भाव के बिना साहित्य नहीं हो सकता। जैसे तर्क के बिना दर्शन नहीं हो सकता था प्रमाण के बिना विज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही भाव के बिना साहित्य नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में, साहित्य को अन्य विद्याओं से अलग करने वाली शक्ति उसकी भावमयता है। अपनी भावमयता के कारण साहित्य का प्रभाव दर्शन या राजनीति से अधिक पड़ता है। यही कारण है कि प्लेटो कवि से कहते थे, दार्शनिक शासकों को सुधारने का काम करे और कवि नागरिकों को सुधारने का। दूसरी बात यह है कि भाव मनुष्य के होते हैं। इसलिए साहित्य में उन मनुष्यों के संबंध चित्रित किये जाते है। मानव-संबंधों के चित्रण के नाते साहित्य का अनुकरणीय प्रभाव और विद्याओं से कहीं अधिक होता है। 

>> भाव और मानव-संबंध  -- यही दो चीजें साहित्य को अपना स्वरूप प्रदान करती हैं। साहित्य मानव-संबंधों के ज़रिये इन सारी चीजों को चित्रित करता है और सारे जीवन को समाहित करता है, यही साहित्य का वैशिष्ट्य है और इसी कारण साहित्य वास्तविक देश-काल का प्रतिनिधि न होकर भी अधिक वास्तव होता है। इसका कारण है। हमारे जीवन में केवल दर्शन नहीं होता, केवल राजनीति नहीं होती, केवल विज्ञान नहीं होता, जीवन में सारी चीजें समाहित हैं। अन्य विद्याएँ जब जीवन को चित्रित करती हैं तो वे कोई एक अंग लेकर चलती हैं, इसलिए वे अपने देश-काल का एक अंग चित्रित करती हैं। साहित्य ऐसी विद्या है जो जीवन के सभी पक्षों को एक साथ चित्रित करती हैं। निस्संदेह, जीवन साहित्य नहीं है, लेकिन जीवन जब साहित्य में आता है, तब वह हू-ब-हू चित्रित न होते हुए भी अधिक वास्तविक चित्र होता है, अधिक विश्वसनीय चित्र होता है। 

>> हू-ब-हू चित्र न होने का अर्थ क्या है? जीवन जब विज्ञान या राजनीति में आता है तो वह काफी निरपेक्ष होकर आता है; जब साहित्य में आता है तो रचनाकार के भाव के माध्यम से आता है। रचनाकार का भावजगत यथार्थ को देखने का 'प्रिज्म' होता है। जीवन का यथार्थ वह किरण है जो रचनाकार के मानस के प्रिज्म में से होकर व्यक्त होती है। इस प्रिज्म से होकर जीवन जब आता है तो उसमें बहुत से रंग आ जाते हैं। इसलिए साहित्य में जीवन थोडा परिवर्तित होकर आता है। यह परिवर्तन कैसे होता है? सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि कोई रचनाकार स्मृति के बिना रचना नहीं करता और कोई रचनाकार स्वप्न के बिना रचना नहीं करता। स्मृति अतीत की खोज है और स्वप्न भविष्य की। जीवन अगर हू-ब-हू होगा तो वर्तमान जैसा है, वैसा ही चित्रित होगा; लेकिन साहित्य में आने पर वह स्मृति यानी अतीत की खोज और स्वप्न यानी भविष्य की खोज से मिलकर आयेगा, इसलिए साहित्य में आनेवाला जीवन हू-ब-हू न होकर भी अधिक मानवीय, अधिक विश्वसनीय और अधिक संभावनाशील होगा। 

>> संक्षेप में कहें तो जीवन का यथार्थ देश-कालबद्ध तात्कालिक वस्तुस्थिति है, रचनाकार का मानस स्मृति और स्वप्न से स्पंदित माध्यम है; अतः साहित्य में व्यक्त यथार्थ के साथ अतीत और भविष्य का सन्दर्भ जुड़ जाता है, वास्तविकता त्रिकालबोध-संपन्न हो जाती है, त्रिआयामी स्वरूप ग्रहण कर लेती है। वह इसलिए अधिक वास्तविक और मानवीय होती है क्योंकि प्रत्येक वस्तुस्थिति अतीत का प्रतिफलन होती है और वह भविष्य की ओर अग्रसर होती है। 

>> एक समस्या और है। प्लेटो मानते थे कि साहित्य अज्ञान पर आधारित है। उससे भी बुरी बात यह है कि जनता पर दार्शनिक से ज्यादा असर कवि का पड़ता है, जबकि दार्शनिक को वास्तविक सत्य का ज्ञान है और कविता सत्य से दुगुनी दूरी पर है --- परम सत्य 'इदोस' (प्रत्यय) की नक़ल यह संसार है और संसार की नक़ल कला है। अतः साहित्य या कला में न वास्तविक जगत का प्रतिनिधित्व होता है, न वास्तविक ज्ञान का अस्तित्व। फिर भी वह मनुष्य के जीवन पर सत्य के दावेदार माध्यमों से अधिक प्रभाव डालती है। इसलिए प्लेटो चाहते हैं कि कवि अगर दार्शनिक के विचारों के अनुसार लोगों को सुधारने में हाथ बँटाता है तो ठीक वरना उसे गणराज्य में रहने की इजाज़त नहीं है। आदर्श राज्य के स्वप्नदर्शी प्लेटो को इतनी शिकायत किसी और ज्ञानानुशासन से नहीं थी, वे किसी और विद्या को नागरिक सुधार के कार्य में लगाने को उत्सुक नहीं थे।

>> इससे यह प्रमाणित होता है कि साहित्य में भले अपना समाज यथावत् न आया हो, उसमें ज्ञान और शिक्षा की अंतर्वस्तु अन्य ज्ञानशाखाओं की तरह न हो, फिर भी उसकी मानवीय सारवस्तु ऐसी है जिसका प्रभाव समाज पर पड़ता है, प्रायः दूसरी विद्याओं से अधिक पड़ता है। इसलिए शासक या सुधारक हमेशा साहित्य-कला को लेकर द्वंद्व की स्थिति में रहते हैं। साहित्य-कला की इस प्रभावकारिता का सम्बन्ध दो बातों से है। कलाकार जब संसार की छवि उतारता है तब वह उसकी व्यावहारिक उपयोगिता का क्षरण अवश्य कर देता है लेकिन अपने भावनात्मक अंतर्जगत से छानकर वह जो चित्र देता है, उनकी मानवीय उपयोगिता बहुत बढ़ जाती है। वास्तविक मोनालिज़ा की मृत्यु हो गयी लेकिन लिओनार्दो द विन्ची की पेंटिंग का सौन्दर्य और जीवन अक्षुण्ण है। वह अपने वास्तविक देश-काल से आगे भी सार्थक बनी हुई है। लेकिन यह संभव नहीं था यदि विन्ची अपने समय के वास्तविक जीवन से उदासीन रहते। अतएव साहित्य का देश-काल वास्तविक न होकर विशिष्ट होता है, अधिक संश्लिष्ट और अधिक मानवीय, वह इतिहासकार या चिकित्सक की तरह उपयोगी नहीं होता लेकिन उनकी तरह एकांगी भी नहीं होता। साहित्य का सम्बन्ध पूरे जीवन से है। वह मानव-सम्बन्धों के माध्यम से अपने देश-काल को अभिव्यक्त करता है। इसीलिए यथावत् न होकर भी अधिक वास्तविक और प्रबावशाली होता है। 

>> संक्षेप में, भावमय अंतर्जगत और मानव-संबंध  -- इन दो विशिष्ट आधारों के कारण साहित्य का देश-काल अपना स्वतंत्र अस्तित्व प्रकट करता है, जिसपर गंभीरता से विचार करना अनिवार्य हो जाता है। 
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(हिन्दी की षण्मासिक/अर्धवार्षिक पत्रिका 'पक्षधर' के जनवरी-जून, 2020 के अंक में प्रकाशित श्री.अजय तिवारी का आलेख 'साहित्य का देश-काल' से उद्घृत)
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(संकलन : @ॲड.लखनसिंह कटरे, बोरकन्हार, जि.गोंदिया.
//18.12.2020//)
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