यवनिका (वैज्ञानिक दृष्टिकोण : एक संक्षिप्त आकलन)

                    *यवनिका*
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> कहा और माना जाता है कि, किताबी ज्ञान से व्यक्ति विविध तंत्रों में तंत्रकुशल तो अवश्य हो सकता है, किन्तु वह विवेकसंपन्न विचारों से प्रगल्भ भी होता ही है, यह नहीं कहा जा सकता। शिक्षाका सभ्यता, औचित्य तथा सुसंस्कारों से सीधा संबंध होता ही है, यह भी नहीं कहा जा सकता। 
> शिक्षित व्यक्ति यदि तथाकथित(?) अंधश्रद्ध समाजिक परिवेश से आता हो, तब उसके व्यक्तित्व में बचपन से ही कर्मकांडात्मक कुलाचार, अलौकिक शक्ति का काल्पनिक भय, अंधश्रद्धात्मक धारणाएँ, आदि संस्कार संचित होने और रहने की सम्भावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। जबतक वह व्यक्ति पूर्वग्रह-मुक्त, विवेकसंपन्न विचारों की ढाल से खुद ही खुद से लढ़कर अपने कालविसंगत तथा अवैज्ञानिक विचारों और धारणाओं में बदलाव लाने का प्रयास नहीं करता तबतक वह व्यक्ति प्रवाहपतित जीवन जीने के लिए ही बाध्य रहता है, यह एक #कटूसत्य है। अनिष्ट वृत्ती तथा अनिष्ट प्रथाओं का विवेकसंपन्न त्याग करने पर ही उस व्यक्ति में उसके अपने स्वयंभू और सच्चे व्यक्तित्व का भान जागृत होता है और वह व्यक्ति किताबी ज्ञान की सीमा लांघकर विवेकसंपन्न तथा सुविज्ञानाधारित विचारों का वाहक तथा प्रवाहक बन जाता/सकता है। उस व्यक्ति की इसी प्रगल्भ अवस्था को उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहा जाता है। 
> वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भारित व्यक्ति सश्रद्ध अवश्य हो सकता है, किन्तु अंधश्रद्ध कभी नहीं हो सकता। प्राचीनतम भारतीय संस्कृती का परिशोधन करने पर हमें इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सच्चे, सम्यक और शाश्वत रूप का परिचय होने लगता है। प्राचीनतम/सनातन भारतीय संस्कृती का अध्ययन/परिशीलन स्पष्ट करता है कि, भारतीय समाज का सांस्कृतिक भान मुख्यतौर पर सदैव वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संचालित/परिचालित रहा है। तभी भारतीय संस्कृती की परंपरा में षडदर्शनों के साथ-साथ चार्वाक और बौद्ध दर्शन भी पनप कर समाज को प्रभावित, प्रवाहित और संचालित करते रहें है। इसमे कुछ अपवाद अवश्य है, किन्तु किसी भी शाश्वत सत्य को सिद्ध करने हेतू उसमे अपवाद का उपस्थित होना अनिवार्य माना जाता है। अतः भारतीय संस्कृती के इस सनातन, शाश्वत, सम्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण में कुछ अपवाद होना अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। 
> अंत में (संक्षेप में ही सही) हम अवश्य कह सकते है कि, मात्र किताबी ज्ञान का और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परस्परावलंबित अस्तित्व अनिवार्य नहीं माना जा सकता, बल्कि व्यक्ति को अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होने/करने हेतू उसे पूर्वग्रह-मुक्त तथा विवेकसंपन्न सुविचारों से प्रगल्भ होना भी अनिवार्य होता है। 
> इसी संदर्भ में मेरे इन अल्पबुद्धि-आकलनात्मक विचारों को सुविद्य पाठकगण पढ़े और मुझे यथोचित मार्गदर्शन करें, इसी अपेक्षा से इस लेखसंग्रह का प्रकाशन किया जा रहा हैं। मेरी यह अपेक्षा अवश्य पूरी होगी, इसका मुझे यकीन है।
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कार्तिक, शुक्ल,(विनायक चतुर्थी), 
शके 1944
दि.28 अक्तूबर 2022 

                                   @ॲड.लखनसिंह कटरे,
                               बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया,
                                          (विदर्भ-महाराष्ट्र)
                                    मोबा. 8208557164
                           ईमेल : lskatre55@gmail.com 
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