हम भारत के लोग...
*हम भारत के लोग...*
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>> भारतीय संविधान कहता है कि, 'हम भारत के लोग' द्वारा यह संविधान 'हम भारत के लोग' के प्रति 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' किया जाता/गया है। इसका नैतिक, वैधानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टी से भी एक अर्थ यह होता है/होना चाहिए कि, 'हम भारत के लोग' द्वारा संविधान में वर्णित सभी प्रावधानों को उसके सही स्पिरीट/परिप्रेक्ष्य में स्वयंपोषित रूप से अपनाकर उनका अनुपालन करना भी 'हम भारत के लोग' के लिए अनिवार्य है। परन्तु क्या आज 'हम भारत के लोग' इस विधान को अपनी कृतियों से सही साबित कर पा रहें है? यह प्रश्न अपनी भयावह उपस्थिति दर्ज कराता 'हम भारत के लोग' को डरा, धमका तो नही रहा है? 'हम भारत के लोग' को अपने अंदर झांककर इन प्रश्नों का जवाब तलाशना अब अनिवार्य हो गया है।
>> संविधान द्वारा प्रदत्त प्रावधानों के अनुरूप वैज्ञानिक चेतना से संपन्न तर्कसंगत समाज बनने/बनाने की 'हम भारत के लोग' की यात्रा फिलहाल रुकी हुई सी लग रही है, जबकि प्रतिगामी सोच, अविवेकवाद, अलगाववाद, पोंगापंथ का बोलबाला और प्रभाव बढ़तासा प्रतीत हो रहा है। अपनी भावनात्मक पहचान, यानि आयडेंटिटी संबंधी संघर्ष बढ़ाकर अपनी अपनी मनमाफिक छद्म विचारशैली को बढ़ावा देने की प्रवृत्ती दिन-ब-दिन फैलती जा रही है। 'हम भारत के लोग' के दिमागी गुहान्धकार में पल रही अतीत की नफरतों की वेदी पर 'हम भारत के लोग' की वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना की रोज-रोज बलि चढ़ाई जाती नजर आती है। आंतरसामुदायिक, आंतरसामाजिक, आंतरसांस्कृतिक सद्भाव बहाल करने की सभी कोशिशों को विफल करने, टकराव के नित नए अवसर ढूंढते रहने, आपसी वैमनस्य बढ़ाने के लिए छद्म कारणों की आग में घी डालते रहने और दुश्मनी बढ़ाकर ध्रुवीकरण करते हुए अपनी ढपली पीटते रहने का खेल फिलहाल अपने चरम पर नजर आता है। यह खेल राजनीतिक पृष्ठभूमि तक ही सीमित रहें तो, कुर्सी का खेल जानकर, एकबार समझा भी जा सकता है। किंतु आजकल यह खेल सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी प्रच्छन्न रुप से खेला जा रहा है। जो 'हम भारत के लोग' के सुवर्णमय भविष्य को धुंधलातासा जा रहा हैं।
>> भेदभाव का यह कुत्सित और विकृत विषाणु, अपनी सूची में नस्ल, धर्म, लिंग, उम्र और वंशावली के साथ अब जाति को भी जोड़कर अपना विष 'हम भारत के लोग' के दिलो-दिमाग में घोलने की कोशिश में नजर आता है। यह नया ट्रेंड 'हम भारत के लोग' की मानवीय संवेदनाओं को भोथरा करने और मनुष्यता को ही मरणासन्न करते जाने का प्रतीक है।
>> वर्तमान समाज का परिदृश्य इस तरह विषाक्त करने के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रयासों के छद्म और प्रच्छन्न रूपों और प्रयासों की सही-सही पहचान कर 'हम भारत के लोग' अपने द्वारा 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' संविधान के मूल स्रोत के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने में सक्षम अवश्य है। जरूरत है तो 'हम भारत के लोग' को अपने अंदर झांककर स्वयंप्रज्ञा से अपनी नैतिकता और मनुष्यता से ओतप्रोत विचारधारा को फिर से प्रवाहित और सुस्थापित करने की।
>> ...और 'हम भारत के लोग' होंगे कामयाब एक दिन! (#350)
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@ॲड.लखनपाल सिंह कटरे "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया (विदर्भ-महाराष्ट्र)
(17.09.2022)
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