बौद्धिक पक्षाघात (हिंदी)

*बौद्धिक पक्षाघात* (हिंदी)
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>> हिंदी की एक सुप्रसिद्ध काव्यरचना 'कामायनी' (1936) में कवीवर्य प्रसाद के कविता की एक पंक्ति है, 
'... दुख देगी यह संकुचित दृष्टि।' 
प्रसाद की यह पंक्ति उदारवाद तथा सहअस्तित्वभाव/सामंजस्यभाव के अभाव से सामाजिक जीवन में पनपते वैरभाव/विद्वेष के बिभिषिका का यथार्थ वर्णन करती है। फूकोयामा के शब्दों में कहे तो यह पंक्ति 'इतिहास का अंत' हो सकने की भविष्यवाणी करती सी लगती है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि, कोई भी एक मानव प्राणी दुसरे मानव का सही-सही प्रतिरूप नहीं हो सकता। वैचारिक, भावनिक, बौद्धिक आदि सभी मामलों में स्वाभाविक विभिन्नता यह मानव जाति के प्राकृतिक अस्तित्व को ही परिभाषित करती है। मानव मात्र/केवल सामाजिक प्राणी ही नहीं, बल्कि एक जैवरासायनिक प्राणी-तंत्र भी है। अतः विभिन्नता यह मानव जाति का एक स्वयंभू गुणविशेष ही माना गया है। लेकिन इसी विभिन्नता में बिखरी समानता की खोज कर उसे बढ़ावा देना यह मानव जाति के शाश्वत अस्तित्व के लिए एक परमावश्यक तथा नैतिक मानवी कर्तव्य भी हो जाता है। इसी कर्तव्य के पालनार्थ उदारवाद और सम्यक, सर्वसमावेशक एकात्मभाव, सहअस्तित्वभाव तथा सामंजस्यभाव प्रणित तत्त्वज्ञानाधिष्ठित विचारधारा का अनुसरण करना हरेक मनुष्य प्राणी के लिए अनिवार्य हो जाता है। 
>> किन्तु जब कोई व्यक्ति या अल्प व्यक्तिसमूह इस कालातीत/सार्वकालिक प्राकृतिक सत्य को जानबूझकर नजरअंदाज कर या नकार कर अज्ञानवश या किसी संकुचित स्वार्थवश मिथ्या अस्मिता को ही अपने तथाकथित तत्त्वज्ञान का जामा पहनाने का प्रयास करता नजर आता है, तब इस/ऐसी विकृत और कुत्सित मानसिकता को पहचान कर उसका प्रारंभ में ही पुरजोर विरोध कर उसे वैचारिक-ध्वस्त करना आवश्यक हो जाता है। इस तरह की मानसिकता बड़े ही मोहक/आकर्षक तथा आक्रमक रूप से प्रचारित होते रहती है। जबकि समाज के तथाकथित मुखिया तथा प्रतिभावान/ज्ञानवान व्यक्ति उनके अपने तथाकथित अहंगंड के मद में मस्त और सुस्त रहकर इस विकृत मानसिकता का खंडन या विरोध करने मे आलस्य कर इस कुप्रवित्ती को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा ही देते है। अंत में यह विकृत/कुत्सित मानसिकता समाजिक नासूर बनकर उभरने लगती है और समाज के बिखराव तथा अलगाव का कारण साबित होती है। और जब सुधी जनों की आँखे खुलती है, तबतक यह जहर बहुत अंदर तक फैल चुका होता है। 
>> उदारवाद, एकात्मभाव, सहअस्तित्वभाव/सामंजस्यभाव को नकारती संकीर्णता भौतिक समृद्धि में भी बौद्धिक खोखलेपन को चरम पर पहुंचाती है और ऐसी अवस्था में स्वर्णिम इतिहास की दशा भी शरणार्थी जैसी होने लगती है। फूकोयामा के उपर उद्घृत कथन ('इतिहास का अंत हो गया है') के प्रकाश में हम देखते है कि, 21वीं सदी में इतिहास को राजनीति और बाजार तथा द्वेषभाव का खिलौना बना दिया गया है। ऐतिहासिक प्रसंगों पर उपन्यास आने लगे है, फिल्में भी बनने लगी है। कई हैं जो इतिहास में कथा का मिश्रण करके इतिहास को ही बेच-खा रहे हैं। इतिहास को द्रौपदी बना दिया गया है। अपने आप को इतिहासकार कहने/कहलाने वाले ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है, जो इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं के वास्तविक अर्थ को अनर्थ तथा भ्रमजाल में बदल डालने का काम करते हैं। इतिहास खिलौना नहीं है, यह आम लोगों की जीवनी--शक्ति है। पर फिलहाल इतिहास से अनधिकार क्रीडा करने वालों की संख्या बढ़ी है। फिर भी, यदि इतिहास में इतिहास को मारने वाली ताकतें रही हैं, वही उसमें मनुष्यता के लिए चले संघर्षों को बचाने वाली ताकतें भी रही हैं। वे बचाने वाली ताकतें कभी-कभी स्पष्ट दिखने की जगह पहाड़ों और मिट्टी के नीचे छिपे उस पानी की तरह रहती हैं, जो चारों तरफ से इकट्ठा होकर कभी भी प्रचंड सहस्राधार की तरह झर/बह सकने की क्षमता रखती है। अतः समाज के तथाकथित मुखिया, प्रतिभावान/ज्ञानवान व्यक्तियों को अपने तथाकथित अहंगंड के मद से निवृत्त होकर उपरोल्लेखित सहस्राधार को झरने/बहने में सहायक ही नहीं सक्रिय होना भी अनिवार्य जान पड़ता है। 
>> इतिहास कोई युद्धास्त्र नहीं है। वह शांति, मनुष्यता, सभ्यता, स्वतंत्रता तथा उदारता की खोज है। इतिहास भले ही पूर्ण विज्ञान न हो और 'अस्थिर' हो, पर मिथ्या चेतना नहीं है। मिथ्या चेतना हमेशा छद्म रूप धारण कर संकीर्ण तथा संकुचित दृष्टिभाव को बढ़ावा देकर वर्तमान समाज में एकजुटता न हो, मिथ्या अहंभाव, मिथ्या अस्मिता तथा क्रूर/विद्वेषपूर्ण अलगाववाद को हवा मिले, ऐसे भाव की वृद्धि होने में ही सहायक साबित होती है, जो सामाजिक एकात्मभाव, सहअस्तित्वभाव, सामंजस्यभाव और उदारता जैसे स्वाभाविक मानवीय सद्गुणों के लिए विघातक और मारक सिद्ध होती है। 
>> यह सब बौद्धिक पक्षाघात तथा छद्म और प्रच्छन्न बौद्धिकता के लक्षण माने गए है। अतः छद्म तथा शर्करावगुंठीत आवरणों से आवेष्टित समाजदुष्ट तथा इतिहासहंता व्यक्तियों के प्रच्छन्न बौद्धिक तथा प्रतिभा-आभासजनक विघातक कारगुजारियों की सही पहचान कर उन्हे ज्ञानसमृद्ध, विवेकाधारित साधार तर्कों, युक्तिवादों तथा तथ्यों से पराजित करके समाज को विनष्ट होने से बचाना, यह समाज के हरेक सुधी-सुजाण, सभ्य, ज्ञानवान, नीतिवान और विवेकशील व्यक्ति का परम कर्तव्य हो जाता है। 
>> इति शम। (#510)
(इस आलेख में व्यक्त विचार भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की मासिक पत्रिका 'वागर्थ' के अगस्त 2022 के अंक में प्रकाशित, संपादक श्री शंभुनाथ जी के संपादकीय में प्रकट, विचारों से प्रेरित है।)
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@लखनपाल सिंह कटरे 'अपराधी'
बोरकन्हार, जि.गोंदिया (महाराष्ट्र)
(25.08.2022)
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