पोवार : एक श्रेष्ठतम, प्राचीनतम ऐतिहासिक समाज

*पोवार : एक श्रेष्ठतम, प्राचीनतम ऐतिहासिक समाज*
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>> पोवार समाज के मूलपूरुष-नारी की उत्पत्ति का साधार एवं सर्वमान्य ऐतिहासिक संशोधन होना अब अनिवार्य जान पड़ता है। पौर, प्रवर, परमार, प्रमार, प्रमर, पोवार, पँवार, पवार यह सभी शब्द-विशेष तथा संकल्पनाएँ अपने मूल स्वरूप को खोजने हेतु हर पोवार बंधु-भगिनी को उद्युक्त करते है। ज्ञात इतिहास को देखा जाए तो हर पोवार व्यक्ति महाराजाधिराज भोज को अपना पूर्वज तथा आदर्श मानते है। किंतु महाराजाधिराज भोज को अपना पूर्वज और आदर्श मान लेने मात्र से हम सच्चे पोवार तथा भोज के वास्तविक समाज-वंशज कहलाने में समर्थ या सक्षम नहीं हो जाते। उसके लिए हमें राजा भोज द्वारा विभिन्न विषयोंको घेरते हुए रचित 84 ग्रंथों में वर्णित ज्ञानसागर को तथा उनके सभी युद्धों में सदा अजेय होने के वास्तविक रहस्य को जान/समझ लेना भी अत्यावश्यक रूप से अनिवार्य हो जाता है। उसीतरह विक्रमादित्य और पुरू(पोरस) इन ऐतिहासिक पुरुषोंका पोवार होने, हमारे समाज-पूर्वज होने के बारेमें पाश्चात्य संशोधक तथा इतिहासकारों के ग्रंथो एवं खोज की खोज भी हमारे समाज के साहसी एवं सजग युवा, प्रौढ संशोधक कर रहे है, यह हमारे समाज के प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के प्रतिपादन एवं जानकारी हेतू बहुतही लाभदायक तथा गौरवपूर्ण बात है। किसी भी अधूरी जानकारी को पूर्ण जानकारी मान/समझकर निष्कर्ष निष्पादित करना तथा उसी के जोर पर अनभ्यास टिप्पणी करना यह अध्ययन तथा संशोधन की गहन तथा कष्टसाध्य प्रक्रिया से दूर भागकर अपनी ओछी हरकत छिपाने जैसा माना जाता है। अतः हमे हमारे इन युवा और प्रौढ संशोधकों तथा इतिहासकारों की हौसलाअफजाई करनी होगी, ताकि ये पोवार समाज के श्रेष्ठतम इतिहास की खोज करने में सक्षम तथा समर्थ भी हो सकें। अध्ययन/संशोधन करने की क्षमता न होना या अध्ययन/संशोधन के लिए आलस्य करना यह दुर्गुण हमे हमारे सच्चे एवं श्रेष्ठ लक्ष्य से भटका सकता है, और हम 'अधजल गगरी छलकत जाए' वाली कहावत को चरितार्थ करने लगते है।अतः हमे अध्ययन/संशोधन करते वक्त सावधान तथा खुले दिमाग वाला होना/रहना अनिवार्य हो जाता है।
>> कभी कभी किसी प्रासंगिक विषय पर 'चलते-चलते' भी की गई टिप्पणी से रूबरू/अवगत होने हेतू हमे उस प्रसंग, वस्तुस्थिती तथा टिप्पणी की वास्तविकता को अपने अध्ययन द्वारा समझ/जानकर ही उसपर अपनी राय व्यक्त करना यह सच्चे अध्ययनकर्ता/संशोधक का प्राथमिक कर्तव्य होता है। किसी वक्तव्य या अल्पांश टिप्पणीपर संदर्भशून्य/संदर्भरहित तथा द्वेषभारित कल्पनाओं के वशीभूत होकर व्यक्त होना यह क्षणभर के लिए अच्छा भी लग सकता है, लेकिन वस्तूतः यह तथ्यों तथा रहस्यों से भागकर अपनी अनभ्यास-वृत्ती, अज्ञानता/मूर्खता छिपाने का एक असफल बहाना मात्र होता है। अतः हमे अध्ययन तथा संशोधन करते वक्त/करते हुए बहुतही सावधान तथा निरपेक्ष और निष्पक्ष भाव से अपनी राय व्यक्त करना अनिवार्य हो जाता है। कभी कभी हम जिस विषय के जानकार नही होते उस विषय के संबंध में भी हम अनधिकार तथा अनभ्यास टिप्पणी कर जाते है, ऐसी हरकतों से हर एक सच्चे अध्ययनकर्ता तथा संशोधक ने बचना चाहिए। आजके इस आधुनिकोत्तर, सत्योत्तर तथा व्यामिश्रतम युग में हर कोई हर विषय का तज्ज्ञ नही हो सकता, अतः व्यक्त होते वक्त अपनी इस स्वाभाविक मर्यादा का ज्ञान जागृत रखना भी हर एक अध्ययनकर्ता तथा संशोधक के लिए अनिवार्य हो जाता है।
>> पोवार समाज के मूल उत्पत्ति के वर्तमान/विद्यमान सिद्धांतों को मद्देनजर रखते हुए हमे नये सिरे से उपलब्ध कुछ संशोधन सामग्री का भी अध्ययन, परिशीलन करना सत्य की खोज हेतू अनिवार्य रूप से अत्यावश्यक हो जाता है। इस दृष्टि से हमें विश्वप्रसिद्ध विचारक एवं संशोधक डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर के दो महानतम ग्रंथ (1)Who were the Shudras, (2) Annihilation of Casts तथा आ.ह.साळूंखेजी का, दोनो महाकाव्य (रामायण, महाभारत) तथा अठारह पुराणों को खंगालकर लिखा गया, तथाकथित(?) ऋषि परशुराम विषयक मराठी ग्रंथ तथा उसीतरह काॅम्रेड शरद पाटील तथा दिलीप चव्हाण द्वारा संशोधित जातिविषयक ग्रंथों का सखोल अध्ययन तथा खंडन-मंडणात्मक संशोधन अनिवार्य तथा परमावश्यक हो जाता है। किंतु इन ग्रंथों को लांघकर या नजरअंदाज कर यदि हम प्राचीनतम तथा ऐतिहासिक पोवार समाज की उत्पत्ति  तथा उद्गम की खोज या इसका संशोधन करना चाहे तो वह संशोधन परिपूर्ण तथा विश्वमान्य होना दुष्कर जान पड़ता है। इन ग्रंथों के अध्ययन/परिशीलन से हमें धीरे धीरे प्रतीत होने लगता है कि, भले ही हम अपने आप को/पोवार समाज को क्षत्रिय कहलाए लेकिन वैदिक मान्यता, वैदिक साहित्य और उनकी/पोवार समाज की जीवनपद्धती की दृष्टि से हमारा वर्तमान समाज ब्राह्मणत्व(ज्ञानोपासना) और क्षत्रियत्व(शौर्योपासना) का एक उत्तमोत्तम मिलाजुला रूप (ब्रह्मक्षत्र) नजर आने लगता है। भगवद्गीता के अध्याय चार के तेरहवे श्लोक* में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की शाश्वत-वाणी के परिप्रेक्ष्य में यह समाज ज्ञान और धैर्य तथा शौर्य का गुणसमुच्चय धारण किए हुए एक प्राचीनतम समाज होने की बात प्रतीत होती है। जो ऐतिहासिक तथ्यों के मद्देनजर सही साबित होती धारणाओं पर भी आधारित है। आज के युग में वर्णाश्रम की बात भले ही मायने नही रखती हो, लेकिन संशोधन करते वक्त हर एक सच्चे संशोधक को सभी उपलब्ध (ऋणात्मक तथा धनात्मक भी) पहलूओं तथा कटूतम तथ्यों(?) पर भी निरपेक्ष तथा निष्पक्ष भाव से अभिव्यक्त होना क्रमप्राप्त तथा परमावश्यक भी होता है। इस दृष्टिकोण से हमारे पोवार समाज के उद्गम तथा उत्पत्ति का अध्ययन/संशोधन हो यह मेरे जैसे ज्ञानसागर में डुबकी लगाने हेतु तत्पर तथा इच्छुक कुछ व्यक्तियों की मंशा है। 
>> मेरे उपरोक्त कथन के लिए मै भगवान श्रीराम के एक सद्गुण 'रिपूणामपि वत्सल' का अनुसरण करते हुए अपनी अल्पांश बात यहाँ समाप्त करता हूँ। तथा पोवार समाज के उद्गम/उत्पत्ति विषयक तथ्यपरक खोज/संशोधन हेतू अध्ययनकर्ताओं तथा संशोधकों को धन्यवाद दे कर उनका अभिनंदन भी करता हूँ। इस संदर्भ में डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे इनकी पूर्व प्रकाशित बुक "पवारी ज्ञानदीप" तथा इंजि.महेन पटले की हाल ही में प्रकाशित ई-बुक "पोवार" यह दोनो बुक्स एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। वैसे उपर उपर पढ़े तो यह दोनो बुक्स परस्पर-विसंगत मत/विचार प्रसृत करती नजर आती है/आएगी, लेकिन भारतीय संस्कृती में मान्यताप्राप्त तथा स्वीकृत वाद-संवाद की प्रक्रिया के सकारात्मक दृष्टीकोण से देखे और परखे तब इन बुक्स में संश्लेषणात्मक एकरूपता का भी दर्शन कर पाने में हम समर्थ होते है। और पोवार समाज का हर प्रबुद्ध व्यक्ती, अपने इस प्राचीनतम, ज्ञानवीर और शौर्यवीर, समाज के ऐतिहासिक पहलूओं के बारे मे के यही सब जानना और समझना चाहेगा भी! 
इति शम।
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(*चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।)
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@ॲड.लखनसिंह कटरे
बोरकन्हार, जि.गोंदिया.
(04.10.2021/22.12.2023)
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