पोवाडा : महाराष्ट्र की लोक संस्कृति का एक अंग (झाडीपट्टी के संदर्भ में) प्रकाशित-मड़ई 2020

*पोवाडा : महाराष्ट्र की लोक संस्कृति का एक अंग*
(झाडीपट्टी के संदर्भ में)/प्रकाशित : मड़ई 2020
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*@ॲड.लखनसिंह कटरे* 
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>> अध्ययन-क्षेत्र के इतिहास तथा संस्कृति इन दो विषयों के दायरें में अक्सर अभिजनों के इतिहास और संस्कृति का ही प्रभाव नजर आता है। जबकि इन दोनों विषयों को सही मायने में समझने के लिए अभिजनों के साथ-साथ बहुजनों के इतिहास और संस्कृति का भी अध्ययन अनिवार्य होता है। इस सत्य को अब अध्ययन क्षेत्र में मान्यता और स्वीकृति भी मिल रही है, यह स्थिति संपूर्ण मानवेतिहास तथा मानव-संस्कृति को समझने/समझाने में सहायक ही साबित होगी/हो रही है।

भूमंडलीकरण का यह वर्तमान दौर कुछ मायने में मानवजाति के लिए कठिनतम है तो कुछ मायने में बहुत ही सरलतम भी प्रतित होता है। इसी दृष्टि से देखा जाए तो हम मानव-संस्कृति के सर्वसमावेशक अध्ययन को, इसी संक्रमण काल में कठिनतम से सरलतम होने की प्रक्रिया और परिणाम, भी मान सकते हैं। अतः हम प्रथम संस्कृति के धाराओं को समझने का प्रयास करेंगे। 

>> संस्कृति को दो मुख्य धाराओं में देखा जाता है। एक है अभिजन-संस्कृति तथा दुसरी लोक/जन-संस्कृति। पोवाडा यह लोक-गीत लोक/जन-संस्कृति का ही एक अंग है। 

 >> हिंदी के वैचारिक साहित्य में हम जब संस्कृति की परिभाषा ढूंढने/समझने की कोशिश करते हैं, तब हमे कोई ठोस परिभाषा नही मिल पाती बल्कि हम और संभ्रमित होने लगते है। अंततः हम संस्कृति की ठोस परिभाषा का बोध पाने में स्वयं को असमर्थ ही पाते हैं। मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार हमारे पूर्वजों ने संस्कृति को मात्र अभिजनों को मद्देनजर रखते हुए परिभाषित करने का प्रयास किया है, जबकि संस्कृति के मूल वाहक - बहुजनों को और उनकी जीवन-पद्धति को - नजरअंदाज किया गया लगता है। उसी दृष्टि से देखा जाए तो संस्कृति यह एक एकरेखीय (Linear) संज्ञा न होकर यह एक संयुक्त/व्यामिश्र (Complex) वस्तुस्थिति/विधा है, जिसमें लोक-संस्कृति का भी समावेश होता है। उसी लोक-संस्कृति के अध्ययन को फिलहाल बहुत महत्व दिया जाता है, यह एकात्मिक मानव-संस्कृति के अध्ययन की दिशा में बहुत ही कारगर और महत्वपूर्ण प्रयास है। इसी कडी में मेरा यह संक्षिप्त आलेख एक अल्पसा प्रयास मात्र है।  

>> इसी लोक-संस्कृति की कडी और संदर्भ में हम महाराष्ट्र की लोक-संस्कृति का एक अभिन्न अंग पोवाडा के बारे में कुछ बातें तथा तथ्य जानने का प्रयास करेंगे। वैसे तो माना जाता है कि, पोवाडा इस विधा का उगम 17 वी शताब्दी में हुआ। इस लोक-गायन विधा का प्रारंभ तत्कालीन तथाकथित दलित जाति के व्यक्तियों द्वारा गोंधळादि लोक-कलादि माध्यमों द्वारा 17 वी शताब्दी में किया गया। इस विधा का पुनरोद्धार महात्मा फुलेजी द्वारा किया गया तथा इस गायन-विधा का प्रयोग राष्ट्रीय आंदोलनों और जनान्दोलनों में भी किया जाता रहा। इस गायन-विधा में वीरों के पराक्रम, विद्वानों की बुद्धिमत्ता, किसी व्यक्ति विशेष के सामर्थ्य, चातुर्य, कौशल्य के साथ-साथ क्रूरता को भी काव्यात्मक वर्णन मे ढाल कर पेश किया जाता है। इस विधा के महाराष्ट्र में सुप्रसिद्ध कुछ सन्माननीय शाहीर इस तरह माने जाते हैं --- शाहीर अमर शेख, शाहीर अण्णाभाऊ साठे, शाहीर साबळे, शाहीर विठ्ठल उमप, .... आदि। महात्मा फुले इनका शिवाजी महाराज का पोवाडा सारे महाराष्ट्र में बहुतही प्रसिद्ध हैं। 

>> और एक मान्यता के अनुसार मराठी का आध्यात्मिक ग्रंथ, श्रीमद्भगवद्गीता की टीकास्वरूप ग्रंथमाता, "ज्ञानेश्वरी" में भी पोवाडा यह शब्द-संज्ञा "पवद" शब्द द्वारा दर्शायी गयी है, ऐसा माना जाता है। अतः ज्ञानेश्वर के काल में भी पोवाडा-सदृश्य लोक-गायन विद्यमान होने की बात भी कही जाती है। सारांश में कहें तो, पोवाडा इस लोक-गायन की सुरुवात किसने की, इस संबंध में कुछ मतभिन्नताएं भी है। अतः इन मतभिन्नताओं को लांघकर हम महाराष्ट्र के पूर्वी छोर पर स्थित विदर्भ के पूर्वी भाग झाडीपट्टी (गोंदिया, भंडारा, गडचिरोली, चंद्रपूर जिले तथा नागपूर जिले का पूर्वी भाग) में गायें और बजायें जानेवाले पोवाडा के बारे में जानने का प्रयास करेंगे। 

>> महाराष्ट्र के झाडीपट्टी के क्षेत्र में आमगांव का चंपाषष्ठी मेला, कुंभली(साकोली) का संक्रांति मेला, पिंपलगाव का बैल-पट का मेला यह बहुत ही प्रसिद्ध मेले हुआ करते थे। इन मेलों में उपस्थित जन समुदाय के रात्रि-मनोरंजन हेतु डंढार(दंडार/दंढार), गोंधळ, तमाशा, खडी गंमत आदि लोक कलाओं का मानो संगम ही होता था। उसी तरह दिवाली के बाद पूर्व विदर्भ के गांव-गांव में आयोजित मंडई में भी इन लोक-कलाओं का मंचन होता था और अल्प प्रमाण में आज भी होता है। इन लोक कलाओं के शाहीर शीघ्रकवी हुआ करते थे। लावणी, पोवाडा, दंडार-गीतों के लेखन और रचना की भरमार हुआ करती थी। उपरोक्त लगभग सभी लोक कलाओं में "जनता की मांग" पर पोवाडा की फर्माईश होती थी। और शाहीर "जनता की मांग" अवश्य पूरी किया करते थे। 

>> पोवाडा के कई "रूप" होते हैं। मसलन पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, नैतिक, क्रिमिनल कथावाहक, अल्प अश्लील, ...। तथा लोक कलाओं के कलगी और तूरा नामक दो मूल प्रकार भी माने जाते हैं। जिसमे कलगी यह प्रकृति यानी स्त्री/आदिशक्ती का रूप तथा तूरा यह पुरुष (निर्गुण) रूप माना गया है। इन दोनों प्रकारों मे गुरु-शिष्य परंपरा को बहुत सम्मान से देखा जाता है और इस परंपरा का पूरी श्रद्धा के साथ अनुपालन भी किया जाता है। झाडीपट्टी के इस क्षेत्र में पोवाडा-कारों की एक बहुत ही श्रेष्ठ परंपरा रही है। नत्थू बाळा (नागपूर),  ....... तथा शाहीर अंबर (कारंजा/गोंदिया), शांताराम सोनवणे (गिरोला/गोंदिया), हेमंतरावजी कटरे (बाह्मणी/आमगांव), हिरालाल भिमटे (बोरकन्हार/आमगांव), बलीराम भगत (बिरसी/आमगांव), ताराचंद सोनवणे (जांभूरटोला/आमगांव), शंकर शाहिर (पदमपूर),... यह कुछ प्रसिद्ध नाम है, गोंदिया जिले के पोवाडा-शाहीरों के। इनके अलावा भी कई नाम पोवाडा-कार/शाहीरों में पूरे झाडीपट्टी में आज भी मशहूर है। 

>> पोवाडा गायन की जो लय होती है, वह बहुत ही मनमोहक तथा आवाहक भी होती है। वीर रस के पोवाडा-गायन में गायक/शाहीर, उनकी मंडली तथा श्रोता सभी उत्तेजित हो कर नाचने भी लगते हैं। करुण रस के पोवाडा गायन में शाहीर का गला रुंध जाता है तथा श्रोतागण तो फूट-फट कर रोने भी लगते हैं। सामूहिक रूदन का यह दृश्य बहुत ही करुणामय हो जाता है। पौराणिक पोवाडा गायन मे शाहीर, उनकी मंडली तथा श्रोता सभी आरती के मूड में आ जाते हैं। पोवाडा इस लोक-संस्कृति के एक अभिन्न अंग की कुछ विशेषताएं भी है, जैसे - प्राकृतिक मुक्तपन, उत्स्फूर्तता, लवचिकता, सहज-सरलता, आकलन-मुक्तता, .....। इन्हीं विशेषताओं के कारणवश यह विधा आज के इस सर्वव्यापी और प्रभावशाली डिजिटल मीडिया के दौर में भी अपना अस्तित्व टीकाएँ/चमाएँ हुए हैं। 

>> अब हम झाडीपट्टी में गायें-बजायें जानेवाले कुछ हिंदी पोवाडों के उदाहरण देखेंगे। 
(वैसे तो झाडीपट्टी का पूरा इलाका महाराष्ट्र में आने/होने से यहां मराठी भाषा ही प्रमुख भाषा है। साथ ही इस इलाके के ग्रामीण अंचल में झाडीबोली भी बहुतायत में प्रचलित है। फिरभी यह इलाका कभी सी.पी.ॲण्ड बेरार इस मुख्यतः हिंदी भाषी राज्य का हिस्सा होने की वजह से इस इलाके में हिंदी भी, मराठी के तर्ज पर ही सही, लेकिन बोली और समझी भी जाती हैं। अतः झाडीपट्टी के शाहीर अपने कवन हिंदी में भी रचते और गाते-बजाते हैं।)
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>> कारंजा/गोंदिया के मशहूर शाहीर अंबर के शिष्य रहे शाहीर शांतारामजी सोनवणे इनके शिष्य उरकुडा ठाकरे (बाह्मणी/आमगांव) इनकी कुछ रचनाओं के अंश यहाँ प्रस्तुत हैं .....
*श्री गण प्रार्थना*
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जय मंगलमूर्ति गणराज 
सभा में पूर्ण करो मेरा काज 
ध्यान लगाकर सुमरू आज 
लाज रखो मेरी, मै बालक हूँ अज्ञान,
बहू अनजान, शरण मै तेरी ||टेक||
हे वक्रतुण्ड गणराया 
तेरे बिन नही किसीकी छाया 
भक्त जन कहते धन्य मोरया 
बड़ा गुणकारी ||
स्वर्ग-मृत्यु-पाताल लोक में 
वेद शास्त्रों में, गण के पुजारी ||
तुम हो श्रेष्ठ महा-पूजन में 
करते हैं ध्यान तुम्हारा जग में 
ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीन लोग में, गीत गाऊ तेरी ||
धन्य शिव-पारबती के लाल 
भक्तों पर ख्याल, सदा रहे तेरी ||
कितना करू गुण का ख्याल,
पतित पावन, अर्ज है मेरी ||
मै हूँ बालक अज्ञान, बहू अनजान, शरण मै तेरी ||
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इसके पश्चात् इन्हीं के एक हिंदी पोवाडा का एक अंश भी देखिए...। यह पोवाडा "कर्ण पर्व का पोवाडा" कहलाता है। 
== श्रोते सजन सुनो लगाकर ध्यान 
सुनो अभी कर्ण पर्व आख्यान 
कुरुक्षेत्र रण के मैदान, युद्ध के द्वारा ||
श्रीकृष्ण लीला चतुराई 
क्या जाने कोई 
पार्थ ने भाई, कर्ण को मारा || गा ||
कौरव दल के सेनापति 
भीष्म और द्रोणाचार्य महारथी 
मारकर समरभूमि के प्रती 
पार्थ सुख पाया ||१|| 
फिर कर्ण सेनापति बनके 
बड़ा बनठनके 
बीर अर्जुन से, लढने को आया ||२||
भराकर पांडवों का दरबार 
धर्म से कहे कृष्ण मुरार 
कर्ण को सेनापति सरदार 
दुर्योधन ने किया 
बड़ा कठिन प्रसंग है आज 
युद्ध का काज 
मेरा धर्मराज, छट गया हिया ||३||
कर्ण सरीखा धुरंधर वीर 
जगत मे दुसरा नही फिर 
दिये भार्गव ने उसे धनुष्य-तीर, विद्या सीखाया |
देके काल-सरीखे बाण 
कर्णको दान, बड़ा बलवान, बीर बनाया ||४||
तुफानी परशुराम के बाण 
कर्ण के बन गए पंचप्राण 
सूर्य ने देके कुंडल दान, कवच चढाया| 
नही लगे बदन में तीर 
बनी खंबीर, वज्र की काया ||५|| ==

>> इस प्रस्तावना के बाद पोवाडे में, -----> चाल चार-टूकी, चाल एक सिंगल, चाल तीन-टूकी और अंत में उडान, के साथ पहली कड़ी समाप्त होती है। 
इसके पश्चात् कड़़ी दूसरी, तिसरी, चौथी और पांचवी कड़ी के उपरोक्त प्रक्रियाओं के बाद यह पोवाडा समाप्त होता है। 

>> उरकुडा ठाकरे के पास लगभग दस-बारह भिन्न भिन्न विषयों पर उनके द्वारा रचित पोवाडों का अनमोल संग्रह संग्रहित है। उनमें अर्जुन की अर्जुनकी, भीम जलवाहन, राजा अंबरीष का द्वादशी व्रत, द्रौपदी वस्त्रहरण, जयद्रथ वध,  आदि हिंदी में तथा श्रीकृष्ण लीला, वृंदा-जालंधर आख्यान, सरुबाई कौडलपूरचा पोवाडा, पद्मावंतीचा पोवाडा, नीलकंठ राजाचा पोवाडा, सत्यवान-सावित्रीचा पोवाडा, मैनेचा पोवाडा(अन्य द्वारा रचित), आदि मराठी में पोवाडे है। 

>> "मैनेचा पोवाडा" यह इस झाडीपट्टी के क्षेत्र में शायद सबसे अधिक गाया जानेवाला पोवाडा माना जाता है। यह पोवाडा एक सत्य घटना पर आधारित है, जिसमें एक राक्षसी वृत्ति से ग्रस्त महिला अपने विवाहबाह्य संबंध को छुपाने हेतु अपने ही पुत्र का वध करती है तथा उसके शव के टुकडे टुकडे कर उसे पकाकर अपने पति को मटन के रूप में परोसती है। क्योंकि उस पुत्र ने अपनी उस कुमाता के विवाहबाह्य संबंध को देख लिया था और यह बात अपने पिता से कहने की हिम्मत व्यक्त की थी। मानव जाति के इस बीभत्स तथा राक्षसी रूप के आत्यंतिक करूण रस का परिपूर्ण वर्णन वाला यह पोवाडा गाते वक्त शाहीर तथा उसकी मंडली और श्रोतागण भी फफकफफक कर रोने लगते थे।

>> इसीतरह बोरकन्हार ग्राम के एक सुपरिचित शाहीर उमराव शिंगाडे, उनके संगी साथी हेमराज मेश्राम, महेन्द्र रामटेके यह भी कुछ वर्ष पूर्व तक पोवाडा-गायन-कला के क्षेत्र में सक्रिय थे। तथाकथित दलित वर्ग के यह शाहीर नागपूर के सुप्रसिद्ध शाहीर नत्थू बाळा को अपना गुरु बताते हैं। इनकी उम्र करीब 85 वर्ष की हो जाने से उन्हें कुछ बाते याद नही, तथा उनका लिखित साहित्य भी नष्ट हो जाने से, एक समय में पोवाडा तथा तमाशा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले, इस शाहीर की रचनाएँ उपलब्ध नहीं हो सकी।  

>> वर्तमान भंडारा जिले के लाखनी तहसील का सिंदीपार ग्राम इसी लोक-संस्कृति के मंचीय कला के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए प्रख्यात रहा है। दंढार, तमाशा, गोंधळ, खडी गंमत, किर्तनादि मंचीय लोककलाओं के लिए यह ग्राम आज भी अपनी पहचान बनाएँ रखे हुए हैं। इस ग्राम के शाहीर लक्ष्मणजी बिसने(बिसेन) की रचनाएँ अभी भी प्रकाश की प्रतीक्षा में है। उनकी एक अल्पांश मराठी रचना यहाँ प्रस्तुत करने का मोह मै टाल नही पा रहा हूँ। उस पोवाडा-रचना के कुछ अंश इस तरह है----
".... मातली नोकरशाही, पेटली महांगाई, किती तू अंत पाही, गजानना हो ||..... गुरु सदाशिव - म्हणे लक्ष्मण - ठिकाण गादी खाना, ..... शाहिर लक्ष्मण सभेत गातो, निशान कलगी बाना....." 

>> झाडीपट्टी में पोवाडा-मंचन-गायन की परंपरा बहुत श्रेष्ठ और सुप्रसिद्ध रही है। इस परंपरा का यह/प्रस्तुत आलेख मात्र एक अंश ही है। इस आलेख को पढ़कर किसी शोधार्थी के मन में इस विषय पर संशोधन की इच्छा उत्पन्न हुई तो मै मेरे इस अल्प-प्रयास को सफल समझूंगा। (1225)
>> इति शम।
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@ॲड.लखनसिंह कटरे 
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया 
(विदर्भ-महाराष्ट्र) // 28.10.2020 //.
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माझा हा हिंदीतील लेख, संगीत नाटक अकादमी, नवी दिल्ली द्वारे वित्तीय सहायता प्राप्त हिंदी वार्षिक पत्रिका "मड़ई -2020" (बिलासपूर, छत्तीसगढ वरून प्रकाशित) मध्ये प्रकाशित झालेला आहे. 
@ॲड.लखनसिंह कटरे
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