पोवार समाज और पोवारी बोली की ऐतिहासिकता : वस्तुस्थिती का संक्षिप्त आकलन (हिंदी)

*पोवार समाज और पोवारी बोली की ऐतिहासिकता :  वस्तुस्थिती का संक्षिप्त आकलन*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
>> पोवार समाज और उनकी पोवारी बोली यह दोनों प्राचीनतम ऐतिहासिकता की वस्तुस्थिति है। इतिहास का विषय मृत अतीत होता है, जीवित वर्तमान नहीं। इसका संबंध उन घटनाओं से होता है जो घट चुकी हैं, चालू घटनाओं से नहीं जो तरलावस्था और निर्माण की प्रक्रिया में हैं। इतिहास का वास्ता उससे होता है जो हो चुका है, न कि उससे जो यदि होता तो.....। इतिहास का विषय आदर्श नहीं, यथार्थ तथ्य होता है। इस तथ्य के मद्देनजर देखा जाए तो, पोवार समाज के उद्गम का पूर्णरूपेण/सही-सही इतिहास अभी भी इतिहास के गर्भ में ही स्थित है। हमारे कुछ पूर्वजों ने इस इतिहास को खोजने/खंगालने का बहुत अच्छा प्रयास भी किया है। वर्तमान में भी हमारे कुछ अधिकृत इतिहासतज्ज्ञ इस इतिहास की खोज में दिलोजान से प्रयासरत हैं। किसी भी समाज का इतिहास यह मात्र कोई एक ठहराव की अवस्था न होकर वह एक अनवरत प्रक्रिया के सदाचलित प्रयास का प्रतिफल होता है। किसी भी समाज के तथ्यपरक इतिहास की खोज करने हेतु तत्कालीन -- हस्तलिखित/प्रकाशित/अप्रकाशित पांडुलिपियों का संग्रह, शिलालेख, ताम्रपट, बखर साहित्य, चलन के पर्याय/सिक्के और मुद्राएँ, वस्तु-विनिमय के पर्याय, दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुएँ (जैसे औजार आदि), प्राचीन भवनों के भग्नावशेष, ... आदि का एकात्मिक रूप से तटस्थ और निरपेक्ष भाव से अध्ययन आवश्यक होता है। पोवार समाज के कुछ मान्यवर पूर्व-विद्वानों ने इस विषय में जो प्रयास और काम किया है, वह वर्तमान के तद्विषयक अभ्यासकों के लिए बहुतही लाभदायक तथा प्रस्तुत साबित होता हैं। विज्ञान के अनवरत खोजों से प्राप्त अद्यतन ज्ञान के मद्देनजर हमारे पूर्वजों का वह अध्ययन हमारे वर्तमान विद्वानों के लिए एक मजबूत धरातल के रूप में उपलब्ध होता है, तथा उस अध्ययन की तत्कालीन कमजोरियों को सुधारने में भी सहायक सिद्ध होता है। इसका मतलब यह नहीं कि हमारे उन पुरखों के अध्ययन को हम कम आंके। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। बल्कि हमारे उन पुरखों का अध्ययन हमारे वर्तमान विद्वानों के लिए एक मजबूत धरातल ही साबित होता है। हमारे पूर्वजों के इन प्रयासों को नकारकर हम अपनीही ढपली बजाने लगें तो वह हमारे पूर्वजों के साथ हमारा कृतघ्नता का बर्ताव ही माना जाएगा। 

>> पोवार समाज की ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आर्थिक, सामाजिक वस्तुस्थिति का सही-सही आकलन करने हेतु हमें पोवार समाज की प्राचीनतम बोली -- पोवारी बोली -- की, उपरोक्त बिंदुओं पर बहुतही महत्त्वपूर्ण भूमिका का भी ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि किसी भी समाज की संस्कृति का सही-सही आकलन करने हेतु उस समाज की बोली/भाषा का ऐतिहासिक "उत्खनन" और भाषिक--अध्ययन बहुतही आवश्यक होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हमारे वर्तमान विद्वानों के लिए पोवारी बोली का भाषाशास्त्र और उच्चारशास्त्र की अद्यतन संकल्पनाओं के मद्देनजर अध्ययन भी आवश्यक हो जाता है। इस दृष्टि से भी हमारे पोवार समाज के वर्तमान विद्वानों ने बहुतही बढ़िया तथा ऐतिहासिक कार्य किया है और अभी भी कर रहें हैं, यह हमारे पोवार समाज के लिए बहुतही गर्व की बात है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 1900-1910 के दरमियान पोवारी बोली की रचनाओं का आधुनिक दौर माना जाता है। तभी से, शायद छिटपुट रूप में ही सही, पोवारी बोली की रचनाएं मौखिक रूप से लिखित/लिपिबद्ध रूप में आना आरंभ हुआ माना जाता है। इस विषय में और अधिक सटीक, सखोल और साधार अध्ययन की आवश्यकता है। लेकिन इसके पूर्व हुए कामों का महत्व और उनकी ऐतिहासिकता को हम पूर्णतः नकार नहीं सकते। 

>> इसी को मद्देनजर रखते हुए दि.04 नवंबर 2018 को सर्वप्रथम डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे, जयपालसिंह पटले, ॲड.लखनसिंह कटरे, ॲड.देवेंद्र चौधरी और अन्य कुछ मान्यवरों द्वारा नागपूर में समाज के मनीषियों की सभा लेकर पोवारी बोली का ग्रांथिक तथा लिखित स्वरूप वर्धित और संवर्धित करने हेतु पवारी/पोवारी बोली साहित्य, कला, संस्कृति मंडल की नींव रखी गयी। तुरंत ही नामनिर्देशित सचिव ॲड.देवेंद्र चौधरी ने, सबकी सलाह से, पोवारी बोली साहित्य, कला, संस्कृति का व्हाॅट्सॲप समूह बनाकर पोवारी बोली की कविता/लेख/कथा स्पर्धा का साप्ताहिक तथा प्रासंगिक आयोजन सुरू किया। जिसके द्वारा आजतक (अक्तूबर 2022 तक) 210 कविता स्पर्धाएं ली जा चुकी है, जिसमें लगभग 65-70 कवियों/रचनाकारों द्वारा लगभग 5000 पोवारी बोली की कविताएँ लिखी/रची गयी है। इसी बीच फरवरी 2019 मे घुमाधावड़ा/तिरोडा, जि.गोंदिया (महाराष्ट्र) में प्रथम अखिल भारतीय पोवारीबोली साहित्य संमेलन का सफलतम आयोजन भी किया जा चुका है। इसी के साथ साथ अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन यवतमाळ (2019) और उस्मानाबाद (2020) में लगातार दो बार पोवारी बोली की कविता का पाठ कर के ॲड.देवेंद्र चौधरी ने एक इतिहास रच डाला है। इससे प्रभावित होकर पोवार समाज के अन्य हितैषी और मान्यवरों ने भी अलग अलग व्हाॅट्सॲप और फेसबुक समूह आदि बनाकर सोशल मिडीया में प्रवेश कर पोवारी बोली के साहित्य, कला और संस्कृति में अपना अपना योगदान देना सुरू किया है। पोवार समाज के कुछ अन्य मान्यवर भी अपने अपने वैयक्तिक स्तर पर पोवार समाज तथा पोवारी बोली के वर्धन-संवर्धन हेतु कार्य करने लगे है। नवंबर 2018 में स्थापित पवारी/पोवारी बोली साहित्य, कला, संस्कृति मंडल से प्रेरणा लेकर आज यह प्रयास एक वटवृक्ष का स्थान ले रहा है, यह हमारे समाज लिए बहुतही गर्व की बात है। इससे समाज का युवावर्ग भी अब स्कूल-काॅलेजों में, सामाजिक व्यवहार तथा व्यवस्था में भी पोवारी बोली में बोलने लगे है। पोवारी बोली में लगभग 30-35 किताबें भी प्रकाशित हो चुकी है। पोवारी बोली की दो किताबें (ॲड.देवेंद्र चौधरी, ॲड.लखनसिंह कटरे और इंजि.महेन पटले इनकी किताबें) ई-बूक के रूप में आकर सोशल मिडीया में (देश-विदेश में) अच्छा खासा स्थान पा चुकी है।

>> ऐसे हमारे पोवार समाज और पोवारी बोली की प्राचीनतम ऐतिहासिकता को और इसके पूर्व-अध्ययनकर्ताओं को नजरअंदाज कर कुछ स्वनामधन्य और तथाकथित पढे-लिखे तथा स्वयंघोषित छद्म तथा प्रच्छन्न उपाधियों से ग्रसित(!) बोलबच्चन व्यक्ति, 
|| "वर्तमान में ही इस विषय की सुरुआत हुई, 
मैने/हमने ही इसकी शुरुआत की," ||
ऐसा लिख/बताकर पोवार समाज की वर्तमान/युवा पीढी को बरगला कर इतिहास की छद्म, प्रच्छन्न, विकृत, एकांगी, बालबुद्धि और भ्रमजनित प्रवृत्तियों को बढावा देने के लिए प्रयासरत दिख रहे हैं। अतः वर्तमान में पोवार समाज के प्रबुद्ध युवा पीढ़ी के लिए यह बहुतही आवश्यक हो जाता है कि वह इन छद्म, प्रच्छन्न, दिग्भ्रमित/भ्रमजनित, एकांगी, बालबुद्धि तथा विकृत धारणाओं के गर्त में न आकर स्वयं पोवार समाज और पोवारी बोली की सुदृढ, स्वाभिमानी और प्राचीनतम ऐतिहासिकता का और वर्तमान में उसके वर्धित स्वरूप का अध्ययन कर समाज की सही-सही पहचान को उभारें। क्योंकि स्वयं-अध्ययन ही तथ्यों को उजागर करने में सहायक साबित होता है। 
>> जय पोवार समाज! 
>> जय पोवारी बोली!
>> जय राजा भोज! 
¤
@ॲड.लखनसिंह कटरे 
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया 
(22.10.2022)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


Comments

Popular posts from this blog

एक शोकांतिकाच (?)

ॲड.लखनसिंह कटरे : शब्द, समाज आणि संवेदनांचा संगम (साहित्यिक अभिमत : by ChatGPT)

झाडीपट्टी/झाडीमंडळ आणि तेथील झाडीबोली व पोवारीबोली (कला, साहित्य, संस्कृती व परंपरा) : एक आकलन