मै भिगता रहा बेमौसमी बरसात में.... (एक हिंदी कविता)
*मै भिगता रहा बेमौसमी बरसात में ...*
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मै भिगता रहा बेमौसमी बरसात में
नही हुआ फिरभी मिलना उससे
मौन की गहराई गहराती रही
शब्दों ने नकारे फिर सारे किस्से।
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चहुंओर धूम थी घुमड़ते आवाजों की
ओंठों से लफ्ज़ नही निकल पाएं
पहरेदार पहरे पर चारों ओर तत्पर
आखिर झंडे सफेद ही लहराएं।
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सवाल बहुत थे जवाबों के घेरे में
आंगन में कंगना फिर भी खणकते थे
सभी सवाल दहक उठे अकस्मात
किंतु बरसात से जवाब ही गायब थे!
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बेमौसमी बरसात बरसती रही
भिगता रहा मै प्रांगण में बेतहाशा
मिलने की आस धुंधलाती रही
और 'ठस' गयी आशा में निराशा।
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शब्दों का छल और विलास शब्दों का
मनोरम संगम में बस बहक गया
शब्दों का आधार शब्दों ने ही खोया
और शब्दों से अर्थ सारा लुढ़क गया।
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बरसातें होती रही मौसम-बेमौसम
भिगता ही रहा मै भी भिगते भिगते
सुकून सुकने का खो गया कहीं
मिलने की आस टूटी टूटते टूटते।
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@लखनपाल सिंह कटरे "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया (विदर्भ)
(12.12.2020)
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