एक पत्र
बोरकन्हार-441902/जि.गोंदिया/महाराष्ट्र
दि.12.07.2019
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प्रबंधक,
राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज
नई दिल्ली-110 002.
सादर नमस्ते.
मेरी मातृभाषा भलेही हिंदी की उपभाषा पोवारी है, लेकिन महाराष्ट्र का रहिवासी होने के नाते कभी-कभी मेरी हिंदी मराठीकरण का शिकार हो जाती है। अतः सर्वप्रथम क्षमस्व।
अरुंधति राॅय द्वारा लिखित, अनिल यादव तथा रतन लाल द्वारा अनुवादित और आपके द्वारा प्रकाशित "एक था डाॅक्टर एक था संत" अभी अभी पढ़कर समाप्त की है। यह पुस्तक पढ़ने के पश्चात मेरी अल्पबुद्धि की प्रतिक्रिया से आपको अवगत कराना चाहता हूँ।
1)संशोधन की विश्वमान्य प्रक्रिया मे सर्वप्रथम उपलब्ध, अनुपलब्ध सामग्री जमा की जाती है। उसके बाद उन सामग्री मे सम्मिलित (या यूँ कहे, उनसे प्राप्त) कथ्य और तथ्यों की/का तटस्थ, निरपेक्ष, भेदभावरहित, प्रामाणिकता और नैतिकता के प्रकाश मे छानबीन, समीक्षा, परिशीलन करने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है। तभी वह निष्कर्ष वैज्ञानिक पद्धति से परिष्कृत निष्कर्ष कहलाने को पात्र होता है। लेकिन इस पुस्तक को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद मुझ जैसा अल्पज्ञ पाठक भी समझ जाता है कि, इस पुस्तक का निष्कर्ष सर्वप्रथम निश्चित करने के बाद, उस तथाकथित निष्कर्ष की पुष्टि हेतु उपलब्ध और अनुपलब्ध तथ्यों को तुकड़ों में तोड़मरोड़कर पेश करने की एक सफलतम वकील की प्रतिभा यहाँ काम कर रही है। गांधी और आंबेडकर को समझना इतना आसान भी नही है। मराठी के एक विचारक प्रा.हरी नरके उनके एक मराठी लेख "गांधी आंबेडकर मित्र नव्हते, पण शत्रूही नव्हते" (गांधी आंबेडकर मित्र नही थे, किंतु शत्रु भी नही थे) मे उन दोनों के मकसद और कार्यप्रणाली का अच्छा विश्लेषण करते है। लेकिन अरुंधति राॅय जी ने समन्वय की गौतम बुद्धप्रणित सौम्य मार्ग की तकरीर/पद्धति को त्यागकर सिर्फ उपरी मतभेदों को उजागर करने का, सम्भवतः पुस्तक को बेस्ट सेलर बनाने हेतु, भोंडा और भड़काऊ वर्णन मात्र किया है, ऐसा लगता है। वैसे हर महापुरुष अपने आप में एक अलग entity/व्यक्तित्व होता है। उनकी तुलना करना कठीणतमही नही असंभव भी होता है।
2)उसी तरह गांधी और आंबेडकर की असंभाव्य तुलना करने के 'बेस्ट सेलरीय' प्रयास मे अरुंधति जी ने एक पुरानी कहावत को चरितार्थ कर दिया है। उस कहावत के अनुसार अपनी या अपने पक्षकार की लकीर/रेखा लंबी (Long) दिखाने हेतु दुसरे की या दुसरे के पक्षकार की लकीर/रेखा छोटी(Short) दिखाने की विधा का इस्तेमाल किया जाता है। और इस विधा के बखान के चक्कर में मूल मुद्दे को नजरअंदाज किया जाता है। मुझ अल्पज्ञ को इस पुस्तक मे अरुंधति जी द्वारा इस विधा का बड़ी शिद्दत के साथ धड़ल्ले से इस्तेमाल दिख रहा है।
3)मुझे अबतक की सबसे सफल(!) हिंदी फिल्म "शोले" की याद बारबार आती रही, पूरी पुस्तक पढ़ते वक्त। "शोले" मे अमिताभ बच्चन का चरित्र धर्मेन्द्र के चरित्र की बसंती के मौसी के समक्ष जिस तरह तारीफों(?) के पूल बांधते हुए प्रशंसा(?) करता है, उसी तरह इस पुस्तक में कई जगह अरुंधति जी ने गांधी की तारीफ(!) (भी) की है। शायद यह पुस्तक को बेस्ट सेलर बनाने का सफल तरीका भी हो सकता है।
4)खैरलांजी यह ग्राम मेरे निवास ग्राम के समीप ही है। अतः मै अरुंधति जी से प्रार्थना करूंगा कि, खैरलांजी की घटना को सही रूपसे समझने/जानने हेतु अरुंधति जी अपनी पहचान छुपाकर (सम्भवतः तथाकथित अछूत बनकर) खैरलांजी में या निकट के किसी ग्राम में करीब छह माह तक निवास करें। उन्हे किसी अन्य बाहरी व्यक्ति के सहायता की आवश्यकता न पड़कर भी वास्तविक वस्तुस्थिति का संज्ञान होगा। (खैरलांजी की घटना मानवता पर घोर कलंक है, मैने हमेशा इस घटना की निंदा ही की है। इस घटना के निषेध हेतु हुए आंदोलन में मै यवतमाल में सम्मिलित भी था। लेकिन उसका कटु सत्य और पार्श्वभूमी भी जानना आवश्यक है।)
अंत में आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय पर (एकांगी ही सही) पुस्तक प्रकाशित कर नई पीढ़ी को इतिहास के कुछ अनसुलझे पन्ने उपलब्ध कराये।
पुनश्च आपका साधुवाद।
मेरी इस अल्पबुद्धि की प्रतिक्रिया से मेरे द्वारा कहीं कुछ अधिकारातिक्रमण हो गया हो, तो क्षमा चाहूँगा।
□आपका एक पाठक
@लखनपाल सिंह कटरे "अपराधी"
बोरकन्हार-441902, तह.आमगांव, जि.गोंदिया
(विदर्भ-महाराष्ट्र) (WhatsApp 9665041483)
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