...और एक बकवास... (हिंदी)
◇◇◇...और एक बकवास(?)...◇◇◇
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आज फिरसे थोड़ीसी बकवास करना चाहता हूँ. बात यह है कि मै कुल 53 पत्र, पत्रिकाएं, अखबार मंगाता हूँ, पढ़ता भी हूँ. (मै इन सबका ग्राहक हूँ.) साथ साथ कुछ ग्रंथ/किताबे भी पढ़ता हूँ. मै इससे अपनी कोई बढ़ाई नही मार रहा, शायद मै अपनी मजबूरी(?) बयान कर रहा हूँ. मेरी अल्पबुद्धी के अनुसार अभीतक हम "सत्य" की अंतिम खोज कर पाने मे सफल नही हो पाए है. अतः मै अभीतक किसी भी विचार-वाद या विचारसरणी के चक्रव्यूह की शरण मे नही जा पाया हूँ. मेरी अल्पबुद्धी द्वारा सत्य(!) की खोज(?) जारी है. शायद इसीवजह से मुझे मेरी अगाध अज्ञानता का ज्ञान है. मराठी, हिंदी और अंग्रेजी मे मेरी "पाठशाला" अनवरत चल रही है. मुझे (शायद) किसीभी विचार-वाद या विचारसरणी से बैर (फिलहाल तो) नही है.
लेकिन मार्क्स के हिमनगपृष्ठवाद द्वारा जो भ्रम जगभरमे फैला था, उसकी मृत्यू होनेमे और उसका अनर्थ समझने में मनुष्य बुद्धी को इतने वर्ष लंबा इंतजार क्यों करना पड़ा, यह मेरे लिये अभीतक अनबुझ पहेली रही है. हमारे भारतीय विचारक हमेशा पाश्चात्य विचारकोंको ही क्यो मद्देनजर रखते है, यह भी मै अभीतक समझ नही पाया हूँ. उद्धरण/अवतरण आदि के लिये हमे कईबार अंग्रेजी, जर्मनी, फ्रेंच, लॅटीन आदि के विचारकों के सामनेही क्यों गिड़गिड़ाना पड़ता है, यह भी मै अभीतक समझ नही पाया हूँ. मै "उन्हे" नजरअंदाज करने के पक्ष में नही हूँ, मै सिर्फ "उनको"ही प्राथमिकता और अंतिम महत्त्व देने के हमारे पराजित/परजीवी/न्यूनगंड-ग्रस्त मानस के संबंध में असमंजस में हूँ. मै शायद बहुतही प्राथमिक स्तर पर अटका हूँ.
अखबारोंमे समसामयिक, राजनितिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, भविष्यदर्शी टिप्पणीयोंके बारेमे भी हम कितने भ्रमजालग्रस्त है, यह भी मेरे लिये एक चिंतन(?) का विषय रहा है. रूसी करंजिया, खुशवंतसिंह, गोविंद तळवलकर, माधव गडकरी, अरुण टिकेकर, मा.गो.वैद्य, कुलदीप नय्यर आदि जैसे सटीक टिप्पणीकार मानो गायबही हो गए है. फिलहाल मेरी नजर मे अंग्रेजी मे रामचंद्र गुहा, दिलीप पाडगावकर, हिंदी मे अभय कुमार दुबे, वेदप्रताप वैदिक, मराठी मे विजय दर्डा, सुरेश द्वादशीवार, संकल्प गुर्जर, अमेय तिरोडकर, विनोद शिरसाठ, भाऊ तोरसेकर, रमेश पतंगे, दिलीप करंबेळकर,.....आदि के अलावा सटीक, सुस्पष्ट, पूर्वग्रहमुक्त, संभ्रमशून्य स्तंभालेख पढ़ने को मिलना दुर्लभ होता जा रहा है. शायद हम संक्रमण काल से गुजर रहे है. Quantum Physics तथा अद्यतन जैविकी शास्त्र के नित नवीन शोधप्रक्रिया द्वारा प्रगट वैश्विक सत्य से भी हम कितने अनभिज्ञ है, यह देख/जानकार दुख भी होता है. खैर. मै कभी निराश नही होता, क्योंकी मै इस "खोज" मे आगे बढ़नेमे विश्वास रखता हूँ. और अगाध ज्ञान तथा प्रकृती/निसर्ग के आगे अपने आप को बौना एवं नतमस्तक पाता हूँ. भगवान महावीर (जैन) मुझे क्षमा मांगनेकी हिंमत प्रदान करे, क्षमस्व.
@लखनसिंह कटरे, बोरकन्हार-441902
(Repeat: 24.05.2019)
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